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नीम हकीम खतरा-ए-जान,– अलका गर्ग “अक्श “ गुरुग्राम

 

मेरी नानी के पड़ोस में एक झज्जू मल जी रहा करते थे।किसी को जरा सी छींक आने पर भी उनका घरेलू नुस्खों का पोटला खुल जाता और उनका लंबा चौड़ा भाषण शुरू हो जाता।वे अंग्रेज़ी दवाओं और डॉक्टर के बिल्कुल ख़िलाफ़ थे।
उनको सभी D W D (doctor without degrees)कहा करते थे जिसका मतलब वे कभी समझ नहीं पाए।
एक बार उनको दाहिने पाँव में फोड़ा हो गया।बहुतेरे इलाज किए पर आराम नहीं मिला।तभी मोहल्ले में घूमते फिरते हुए एक झोला डॉक्टर आया।
झटपट झज्जू मल ने अपना फोड़ा उसे दिखाया।
उस झोला डॉक्टर ने कहा कि मुक्ति पाने का बस एक उपाय है कि कौए की ताज़ी बीट को गर्म करके यहाँ लगा लो तो दो दिन में बड़े से बड़ा पुराना फोड़ा भी छू मंतर हो जाएगा।
अब झज्जू मल जी कौए को ढूँढने चल दिए।कुछ दूर जाने ओर कौओं की कांव आवाज़ सुन कर तो उनकी जान में जान आ गई।बस फिर क्या था लपके उनकी ओर परंतु कौए तो उड़ भागे।अब झज्जू उनके पीछे और कौए भागे आगे आगे।
कौओं को देखने के लिए ऊपर मुँह उठा कर दौड़ रहे थे तो नीचे देखा नहीं और बीच राह में पत्थर से ऐसी ठोकर खाई।
धड़ाम से गिरे और फोड़े वाली टांग और भी घायल हो गई।
झोला डॉक्टर बोला आज कल कौए बहुत कम ही दिखाई देते हैं तो उनकी बीट मिलनी मुश्किल है।बेकार में और किसी पक्षी की लगा लिए तो गड़बड़ हो जाएगी।एक और सटीक उपाय है अगर उल्लू के पंख को पानी में दो बार घुमा कर सिन में तीन बार तीन दिन तक पी लिया जाय तो भी घाव फोड़ा सब ठीक हो जाता है।
अब झज्जू मल जी रात को जंगल मे हाथ में टोर्च लिए चल पड़े पंख ढूँढने।
तभी उन्हें पेड़ के एक कोठर में उल्लू जैसा कोई जानवर दीखा।
वे मुँह उठाये उधर चल पड़े पर हाय री क़िस्मत..रात के अँधेरे में एक बड़े पोखर में जा गिरे।उनके गिरने की धड़ाम की आवाज और उनकी चीख सुन कर वह पक्षी भी फड़फड़ा कर उड़ गया।
जैसे तैसे निकल कर घिसटते हुए घर पहुँचे। उन्हें कौआ उल्लू कुछ भी नहीं मिला हाँ चोटें कई मिल गईं।और
बचपन में सुनी कहावत “नीम हकीम खतर-ए-जान” याद आ गई।
झक मार कर अगले दिन दवाखाने जा पहुँचे।

अलका गर्ग “अक्श “
गुरुग्राम

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