संक्षिप्त लेख: नवरात्रि का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक समन्वय — श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर- गुजरात)

चैत्र माह शुक्ल पक्ष में नवरात्रि आते हैं। नवरात्रि एक हिंदू पर्व है जो नौ देवी की पूजा अर्चना की जाती है। देवी दुर्गा की आराधना और उपासना के लिए मनाया जाता यह पर्व है। नवरात्रि साल में दो बार आती है।यही समय ऋतु परिवर्तन का होता है। मनुष्य के खान पान एवं ऋतुओं के बदलाव से प्रकृति का स्वयं रूपांतरण होने की स्थिति आ जाती है। मानव जीवन संवेदनशील होने के कारण अनेक प्रकार की बीमारियों से पीड़ित होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में नवरात्रि को आना एक सकारात्मक परिणाम मिलने का माध्यम बन जाती है।यह पर्व नौ दिन तक चलता है और नव रूपों की नवदुर्गा की पूजा करते हैं।जप तप ध्यान प्रार्थना करते हैं। मां दुर्गा की नौ शक्तियों का संचार मनुष्य जीवन में होता है। संयम साधना ध्यान के माध्यम से ऊर्जा जागृत होती है। नकारात्मक सोच समाप्त करती है। तनाव ग्रस्त जीवन से छुटकारा मिलता है। जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है।यह पर्व शक्ति साहस और ज्ञान का प्रतीक है। यह पर्व आत्म शुद्धि शक्ति उपासना और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। इस पर्व के दौरान सभी लोग आनंद उत्सव मनाते हैं। नवरात्रि के समय रात्रि को गरबा और डांडिया रास शारीरिक व्यायाम का कार्य करते हैं। शरीर सक्रिय और स्वस्थ रहते हैं। पूजा में उपयोग होने वाले धूप पवन सामग्री सुगंधित पदार्थ वातावरण को शुद्ध करने में मदद करते हैं। जीवन को संतुलित स्वस्थ बनाते हैं।शक्तिमय बन जाते हैं। नवरात्र के दिन उपवास और ध्यान करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का लाभ होता है। उस दौरान सभी लोग साथ में पूजा करते हैं जिससे समाज में प्रेम और एकता बढ़ती है। सद्भावना को बढ़ावा देता है। मानव शरीर मन और प्रकृति के बीच संतुलित स्थापित करने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। अपनी भीतर छिपी ऊर्जा को जागृत करते हैं। नवरात्र हमें किसी कठोर नियम से बांधता नहीं है बल्कि स्वयं के साथ अनुशासन स्थापित करना सिखाते हैं। अध्यात्म और विज्ञान अलग नहीं है।
बल्कि एक ही सत्य के दो रूप है। अध्यात्म भीतर की यात्रा करता है। विज्ञान यह बताता है कि वह यात्रा हमारे शरीर और मन पर कैसे प्रभाव डालती है।यही इसकी बड़ी शक्ति है।
श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर- गुजरात)




