शिकायती व्यक्तित्व — लेखक : अभि ‘ अनंत ‘ अभिषेक कुमार शर्मा

शिकायत, व्यक्तित्व का एक गुण है या फिर दोष। यह इसकी मात्रा पर निर्भर करता है। अगर हम ज्यादा शिकायती हो जाते हैं तो यह हमारा दोष बन जाता है। थोड़ा शिकायत करना चल सकता है परंतु सदैव शिकायत ही करते रहना हमें कुछ और ही बना देता है। शिकायती होने का अर्थ है- सदैव दोष ही ढूंढते रहना। ऐसा व्यक्ति सामान्यतः कर्तव्य परायण न होकर अधिकार सजग होता है। बस की खिड़की से कचरा बाहर फेंकने वाले भी बस से उतरकर,
” छीं! कितनी गंदगी है यहां। सरकार कुछ करती ही नहीं।” कहते हुए मिल जाएंगे। कहा भी गया है:
“कर्तव्यपालनं कृत्वा यः सदा निरतो भवेत्।
तस्यैव राजते लोके परिदेवन-भाषणम्॥
अर्थात् जो व्यक्ति सदैव कर्तव्य पालन करता है उसी व्यक्ति के द्वारा की गई शिकायत इस संसार में शोभा देती है।
परन्तु व्यावहारिक तौर पर ऐसा है नहीं। अधिकार सजगता तो हम सब में इतनी पाई जाती है कि इसके लिए हम मरने – मारने के लिए तैयार हो जाते हैं पर जब बात कर्तव्यों की आती है तो बगलें झांकते हैं।
जिनसे कर्तव्य पालन ही नहीं हो रहा उनसे बलिदान की अपेक्षा करना मूर्खता है। जिसे संपूर्ण व्यवस्था से ही शिकायत हो वह इस व्यवस्था के लिए बलिदान क्यों ही करेगा।
परन्तु कर्तव्य पालन का भी अपना ही एक आनंद है। हमारे समाज में हम अपने आस पास कुछ ऐसे व्यक्तित्वों को पाते हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अपने कर्तव्य पालन को समर्पित किया हुआ होता है।आप मेरी इस बात से ज़रूर सहमत होंगे कि जब ऐसे किसी कर्तव्य समर्पित व्यक्ति के अधिकारों का हनन होने लगता है तो उसके अधिकारों की रक्षा के लिए उससे पूर्व कोई और ही खड़ा मिलता है। कभी- कभी एक से ज्यादा लोग भी तैयार हो जाते हैं ऐसे व्यक्ति के अधिकारों के संरक्षण हेतु।
फिर एक बहस यह भी छिड़ जाती है कि तब तो किसी बात का विरोध या शिकायत करनी ही नहीं चाहिए। हर बात को किस्मत या नियति समझ स्वीकार कर लो।
ऐसा नहीं है ।
मैंने शुरुआत में ही कहा कि शिकायत तब ही तक अच्छी है जब तक इसकी मात्रा सीमित हो। अत्यधिक शिकायती होना व्यक्तित्व को विकृत बना देता है।
संतुलित व्यक्तित्व वह है जिसमें शिकायत का स्थान हो परन्तु यदि वह स्वयं उस शिकायत का समाधान भी दे तो बेहतर हो। साथ ही श्रेष्ठ यह भी रहे कि उस शिकायत के समाधान में यदि आवश्यक हो तो सर्वप्रथम सहयोग उस व्यक्ति का ही हो जिसे शिकायत हो।
शिकायत एक जगह अच्छी होती है। वह है खुद से शिकायत, क्योंकि इस जगह समाधान त्वरित हो जाता है। स्वयं से शिकायत रखने वाला और जल्द समाधान करने वाला व्यक्ति उत्तरोत्तर प्रगति करता है और उसका व्यक्तित्व और ज्यादा निखरता है।
इसीलिए
“यदि बदलाव चाहते हो तो पहले खुद को बदलना सीखो।”




