स्टेटाटन — अभिषेक कुमार शर्मा

आज घाट पर लोग जलती लाशें देखने जाते हैं l विसर्जन अब पर्यटन हो गया है। यह सुविधा उपलब्ध नहीं वरना लोग यमराज के साथ फोटो लेते और लास्ट पिक नाम से शेयर करके जाते या उनके भैंसे के साथ भी दो चार फोटो ले ही लेते। कितना जरूरी है आज स्टेटस लगाना।
॥ कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ॥
इस श्लोक में ‘ कर’ की जगह मोबाइल पढ़ा जाए तो बेहतर होगा। उठते ही पहले वही जो देखा जाता है। आज हम देख रहे हैं कि युवा वर्ग में अलग सी ही दीवानगी देखी जा रही है देशाटन या तीर्थयात्रा की। ऐसा कतई नहीं है कि समूचा भारत कलयुग से सतयुग की ओर बढ़ निकला हो पर इसके पीछे की सच्चाई सिर्फ फोटो लेना ही है ताकि स्टेटस लगाया जा सके। पता नहीं भगवान इन स्टेटस को देखते भी होंगे या नहीं।भगवान के पास मोबाइल भी होगा या नहीं। यह तीर्थाटन नहीं बल्कि ‘ स्टेटाटन’ है। यदि फोटो लेना प्रतिबंधित कर दिया जाए तो तीर्थाटन बंद ही हो जाएगा। देवस्थानों की भी अपनी मजबूरी है। लोग पर्यटन नहीं करेंगे तो रोजगार कैसे बढ़ेगा। पर ये स्टेटस वाली भक्ति थोड़ी समझ से परे है। आज मदद से पहले मोबाइल निकलता है।
काशी में जन्मे कबीर काशी छोड़ मगहर चले गए ताकि आडंबर पर गहरी चोट कर सकें। पर इस मोबाइल वाली भक्ति पर यदि चोट करने की सोची जाए तो मेरे हिसाब से ये भक्ति ही बंद हो जाएगी। अगर दिखा नहीं पाए तो कार्य किया ही क्यों जाए।
इक्कसवीं सदी के बीते पच्चीस वषों में लोग कई देवता बदल चुके हैं और शायद और भी बदलते जाएंगे। छुट्टियां मिलते ही एक रेला निकलता है इस दौड़ को दौड़ने । आज तो यह एक सोशल स्टेटस बन गया है कि यदि आप छुट्टियों में कहीं घूमने नहीं गए तो आप पिछड़े हुए हो। हर बार कहीं घूमने निकल जाने वाले का स्तर ऊंचा समझा जाता है। यह प्रदर्शन का प्रपंच न जाने हमें कहां ले जाएगा। आत्म श्लाघा का यह स्तर हमें इस और धकेल रहा है कि अपने जीवन के नित्यकर्मों का भी प्रदर्शन कर हमें अपने हर किए की सामाजिक या यूं कहूं कि आभासी मान्यता चाहिए। चूंकि नापसंदगी का कोई बटन ही नहीं दिया जाता तो हर किए की सिर्फ प्रशंसा ही करनी है। सोचिए किसी शोक संदेश को भी सिर्फ लाइक ही किया जा सकता है।
व्यस्तता चाहे कितनी भी हो स्टेटस लगाना भगवान की आरती करने जितना ही महत्वपूर्ण है। स्टेटस न लगाएं तो लोगों का मन कच्चा सा होने लगता है। SMS के दौर में जहां इस ढकोसले से सब शुरू हुआ था कि फलां फलां sms 11 लोगों को भेजिए कोई शुभ समाचार मिलेगा और यदि नहीं किया तो कुछ बुरा भी हो सकता है। आज ये कारवां चलता चलता काफी दूर निकल आया है। जहां आप यदि दुःखी हैं और आपने स्टेटस नहीं लगाया है तो सही मायने में शायद ही दुःखी हैं। खुद की स्तुति में किया गया यह कार्य ऑक्सीजन जितना ही महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।
पहले आयोजन पर फोटो खींची जाती थी और स्टेटस लग जाता था आज स्टेटस के लिए आयोजन हो रहें हैं। प्री वेडिंग शूट इसी परम्परा की देन है और ये प्री वेडिंग शूट वालों ने तो हद ही पार कर दी है। रचनात्मकता के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। हाल ही में एक जोड़े ने अपना प्री वेडिंग शूट कूड़े के ढेर के पास किया। कुछ अनोखा करने के लिए कुछ भी किया जाना फैशन बन गया है। स्टेटस केवल आडंबर तक ही सीमित होता तो शायद निंदा का शिकार न होता परन्तु यह जानलेवा भी है। नदी किनारे, जलस्रोतों के पास, चलती ट्रेन के आगे, बाइक चलते हुए और भी न जाने कैसे कैसे वीडियो बनाते हुए हजारों – हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई है। ठहरना होगा। हमें कहीं तो ठहरना होगा। एक देश ने बीते सालों में अपनी संसद में कानून बना कर अपनी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का ढांचा बदल दिया और सभी बच्चों की शिक्षा पेन, पेंसिल और नोटबुक को छोड़कर टेबलेट पर दी जानी शुरू कर दी। अगले चार वर्षों बाद जब इस निर्णय का मूल्यांकन किया गया तो पाया कि उस समय विशेष के बच्चे न केवल आंखों से जुड़ी समस्या से ग्रस्त हैं अपितु वो अधीर, चिड़चिड़े, गुस्सैल, रचनात्मकता के अभाव युक्त भी पाए गए। इस दुष्परिणाम को देखते हुए सरकार ने तुरंत निर्णय लिया और पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू कर लिया।
तकनीक पर इतनी निर्भरता क्या सही है? साथ ही यह तकनीक यदि लाभदायक होने के साथ साथ नुकसानदायक भी हो तो इसके उपयोग के नियम बनाए जाने अपेक्षित हैं। जीवन को आसान बनाने के लिए यदि यह किया जा रहा है तो फिर भी इसकी तारीफ की जा सकती है परंतु स्टेटस की ये जो बीमारी है वो घातक रूप न ले ले हमें सोचना होगा।




