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आलेख _ दया ही धर्म है — सपना बबेले स्वरा

 

मानव जीवन का सबसे बड़ा आभूषण दया है। दया वह गुण है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। बिना दया के हृदय पत्थर समान हो जाता है। धर्म का वास्तविक अर्थ केवल पूजा-पाठ, व्रत-उपवास या धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं है, बल्कि दूसरों के प्रति करुणा और सहानुभूति रखना ही सच्चा धर्म है। इसलिए कहा गया है दया ही धर्म का मूल है।
दया का अर्थ है दूसरों के दुख को समझना और यथासंभव उसे दूर करने का प्रयास करना। जब हम किसी भूखे को भोजन कराते हैं, प्यासे को पानी पिलाते हैं या किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना देते हैं, तब हम सच्चे धर्म का पालन करते हैं। धर्म केवल मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे तक सीमित नहीं है, वह हमारे व्यवहार और आचरण में दिखाई देता है।
महापुरुषों ने भी दया को सबसे बड़ा गुण माना है। भगवान बुद्ध ने करुणा का संदेश दिया, महावीर स्वामी ने अहिंसा और दया को जीवन का आधार बताया, और महात्मा गांधी ने भी सत्य और अहिंसा के साथ दया को अपनाया। इन सभी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा रखने में है।
आज के समय में जब समाज में स्वार्थ और कठोरता बढ़ रही है, तब दया की आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है। यदि हम अपने आसपास के लोगों के प्रति संवेदनशील बनें और उनके दुख-दर्द को समझें, तो समाज में शांति और सद्भाव स्वतः स्थापित हो जाएगा। दया से ही आपसी प्रेम बढ़ता है और मानवता सुरक्षित रहती है।
अतः कहा जा सकता है कि धर्म का सार दया में ही निहित है। दया से ही मानव जीवन पवित्र और सार्थक बनता है। अतः हमें अपने जीवन में दया को अपनाना चाहिए, क्योंकि वास्तव में दया ही सच्चा धर्म है।

सपना बबेले स्वरा

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