प्रश्न: क्या आप मानते हैं कि लेखन स्मृतियों को अमरता प्रदान करता है. — राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

जी हां!.. लेखन स्मृतियों को अमरत्व प्रदान करता है। लेखक अपने विचार लिख कर दुनिया से विदा हो जाता है किन्तु उसने जो लिखा है वो दस्तावेज बनकर हमेशा के लिए जीवित रहता है। ऐतिहासिक तथ्य हों अथवा सदियों पूर्व रचे हुए ग्रन्थ अभी भी हैं और भविष्य में भी कायम रहने वाले हैं।कितनी ही सदियों पूर्व लिखी गई महर्षि वाल्मीकि जी रचित रामायण और वेद व्यास रचित महाभारत और तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस अब भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी सदियों पूर्व हुआ करती थी। मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है, उसे ज्ञात होता है कि पता नहीं कब मृत्यु हो जाए इसलिए वो अपने भीतर उत्पन्न भावों, विचारों को लिखता रहता है ताकि आने वाली पीढ़ी उससे ज्ञान प्राप्त कर सके। उसके विचारों से प्रभावित हो सके। निरन्तर परिवर्तित मानसिकता और भावों को वो लेखन के द्वारा अमरत्व प्रदान करता है। महात्मा गांधी सुभाष चन्द्र बोस, भगतसिंह, गुरु श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर को हमने देखा है ना सुना है, किंतु हमने पढ़कर उनके बारे में जाना है,उनके व्यक्तित्व को पहचाना है। जीवन में हम हजारों लाखों लोगों से मिलते हैं और एक समय भूल जाते हैं लेकिन जिन महापुरुषों को हमने पढ़ा है उन्हें नहीं भूल पाते। मुंशी प्रेमचंद जी, रामधारी सिंह दिनकर,संत कबीर दास जी, मीराबाई,सूरदास जी आदि महाकवियों लेखकों साहित्यकारों को हम आज भी जानते हैं। इन महान हस्तियों को आज भी पढ़ते हैं,गुनते हैं क्योंकि उनके लिखित दस्तावेज हमने पढ़े हैं। अतः कह सकते हैं कि लेखन स्मृतियों को अमरत्व प्रदान करता है।
राजेन्द्र परिहार “सैनिक”




