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रेत सी फिसलती ज़िंदगी और टूटते रिश्तों का सच, सुनिता त्रिपाठी’अजय जयपुर राजस्थान

 

ज़िंदगी आज रेत की तरह हमारी मुट्ठी से फिसलती जा रही है, और हम हैं कि इस क्षणभंगुर जीवन पर घमंड किए बैठे हैं। जिस पल को जीने के लिए मिला है, उसी को अहंकार, दिखावे और स्वार्थ की भेंट चढ़ा दिया गया है। समय का पहिया तेज़ी से घूम रहा है, पर इंसान ठहरकर आत्ममंथन करने की बजाय स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने के भ्रम में जी रहा है।
आज सफलता का पैमाना इंसानियत नहीं, बल्कि पद, पैसा और प्रतिष्ठा बन गया है। इसी घमंड में हम यह भूल जाते हैं कि जिन रिश्तों ने हमें जीवन की राह पर चलना सिखाया, वही रिश्ते सबसे पहले हमारी उपेक्षा का शिकार बनते हैं। परिवार, मित्रता और प्रेम—सब कुछ अब सहनशीलता की डोर पर टिका है, जो ज़रा-सी खींचतान में टूट जाती है।
रिश्तों के बिखरने की एक बड़ी वजह है—तीसरे की ‘कानों में फूंकी गई बात’। आज हम अपनों से सीधे संवाद करने की बजाय बाहरी आवाज़ों पर अधिक भरोसा करने लगे हैं। बिना सत्य जाने, बिना सामने वाले से पूछे, संदेह की एक छोटी-सी चिंगारी रिश्तों को जलाकर राख कर देती है। किसी तीसरे की राय, ईर्ष्या या स्वार्थ, वर्षों की मेहनत से बने संबंधों को पल भर में तोड़ देता है।
विडंबना यह है कि हम रिश्तों को बचाने के लिए समय नहीं निकालते, लेकिन उन्हें तोड़ने के लिए कारण ढूंढ ही लेते हैं। संवाद की जगह आरोप ने ले ली है, समझदारी की जगह अहंकार ने, और विश्वास की जगह शक ने। नतीजा यह कि रिश्ते कमजोर होते जा रहे हैं और इंसान भीतर से अकेला।
ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने घमंड को त्यागें और विनम्रता को अपनाएँ। ज़िंदगी की रेत को मुट्ठी में कसकर पकड़ने की बजाय, उसे महसूस करना सीखें। रिश्तों को अफवाहों के हवाले करने के बजाय संवाद से संवारें। क्योंकि अंततः न पैसा साथ जाता है, न पद—साथ रह जाती है तो केवल रिश्तों की गरमाहट और हमारे कर्मों की सच्चाई।
अगर अब भी नहीं संभले, तो रेत हाथ से निकल जाएगी…
और पीछे रह जाएगा सिर्फ़ पछतावे का खालीपन।
सुनिता त्रिपाठी’अजय जयपुर राजस्थान

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