कृष्ण और सुदामा की दोस्ती: एक अनमोल मिसाल — सुनिता त्रिपाठी’अजय

कृष्ण और सुदामा की दोस्ती एक ऐसी मिसाल है जो हमें सच्ची दोस्ती का मतलब सिखाती है। यह दोस्ती नहीं, एक प्रेम है जो रक्त के रिश्तों से भी गहरा होता है। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती में कोई भेदभाव नहीं था। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे, जबकि कृष्ण एक राजा थे। लेकिन उनकी दोस्ती में कभी कोई अंतर नहीं आया। सुदामा की गरीबी और कृष्ण की राजसी जीवनशैली के बावजूद, उनकी दोस्ती मजबूत रही।
आज के दौर में दोस्ती की परिभाषा बदल गई है। लोग अब दोस्ती में स्वार्थ और मतलब देखते हैं। लेकिन कृष्ण और सुदामा की दोस्ती हमें सिखाती है कि सच्ची दोस्ती में कोई स्वार्थ नहीं होता, कोई मतलब नहीं होता। आजकल कुछ ही बचे हैं दोस्त, बाकी सब स्वार्थ में हैं। अगर आप हंसकर, चुलबुला कर किसी का काम करते हैं, तो लोग यही मानेंगे कि जरूर कोई मतलब होगा। अरे, इसका काम ही मित्र बनाना है! अगर किसी में मित्र बनाने की कला है, तो वो दुनिया का सबसे अमीर इंसान होता है।
मुझे लगता है कि मित्र बनाना अगर कमजोरी है, तो वो सबसे बढ़िया है। आजकल के दौर में आपको पुराने मित्र मिलना मुश्किल होगा। लोग आपसे अपने स्वार्थ से जुड़ते हैं, आप उनका कार्य करते हैं तब तो आप उनके परम मित्र, और एक दिन कार्य करने से मना कर दो, आपको पता चल ही जाएगा। आजकल के दौर में कुछ ही मित्र होते हैं जो बिना स्वार्थ के आपके साथ हैं, बाकी सब आपसे मतलब के लिए जुड़े हैं।
मैं हंसी-मजाक करके, चुलबुला व बचपने के साथ सभी का काम करने में मुझे खुशी मिलती है। मैं मुंह पर बोलती हूं, जो लोगों को पसंद नहीं है। आजकल जो बटरिंग करता है, वही पसंद आता है। मैं सभी का काम करना और उनके चेहरे पर खुशी लाने की कोशिश करती हूं, पर कुछ लोग इसमें भी मेरी कमी तलाशने की सोचते हैं।
मित्र जो पुराने हैं मेरे, वो सब लाजवाब हैं और नए में भी बहुत से अच्छे हैं। लेकिन जो बात कृष्ण सुदामा की है, वो आजकल के दौर में किसी की नहीं। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती एक ऐसी मिसाल है जो हमें सच्ची दोस्ती का मतलब सिखाती है। यह दोस्ती हमें सिखाती है कि दोस्ती में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, कोई स्वार्थ नहीं होना चाहिए। दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो हमारे जीवन को समृद्ध बनाता है।
सुनिता त्रिपाठी’अजय
जयपुर राजस्थान




