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कविताओं का संगम — सुनीता तिवारी

 

नीति और राज अब सिर्फ़ कविताओं के साथी नहीं रहे,
वे एक-दूसरे की प्रेरणा बन चुके थे।
हर नई रचना में कहीं न कहीं दूसरे की झलक दिख जाती।
राज की कविताएँ अब और गहराई लिए होतीं,
तो नीति के शब्दों में नर्म उजाला घुल आता।

राज को अब नौकरी भी मिल गई थी.
वह सरकारी विभाग में नीति के शहर में ही कार्यभार ग्रहण कर लिए।
पहली तनख्वाह से उन्होंने माँ के लिए नई साड़ी खरीदी
और नीति को भेजा एक छोटा-सा पैकेट.
जिसमें था एक कागज़ का दीपक,
जिस पर लिखा था.

तुमने मेरी कविताओं को अर्थ दिया।
अब मेरे जीवन को भी मिल गया है नीति।

नीति ने जब वह दीपक देखा तो उसकी आँखें भर आईं।
वह समझ गई कि राज अब केवल कवि नहीं रहे
वह जीवन के मार्गदर्शक बन चुके हैं।

दोनों ने मिलकर निर्णय लिया.
वे एक साथ “राजनीति” नाम का मंच चलाएँगे,
जहाँ नई पीढ़ी के कवि अपने मन की राजनीति की रोशनी बाँट सकें।

पहले ही आयोजन में नीति ने मंच पर कहा.

दीप जलाना आसान है
पर किसी के मन में उजाला करना
सबसे बड़ा उत्सव है।

लोगों की तालियों के बीच राज ने नीति की ओर देखा।
वह मुस्कुरा रही थी.
वही शांति, वही अपनापन।
उसी पल राज ने महसूस किया.
दीपावली केवल घर में नहीं,
अब उसके हृदय में भी उतर आई है।

धीरे से उसने कहा.
अब कोई कविता अधूरी नहीं लगेगी नीति,
क्योंकि तुम मेरी हर कविता की पूर्ण विराम हो।

नीति हँस दी.
और तुम मेरे हर वाक्य के अर्थ!

दोनों के बीच शब्दों से आगे बढ़कर
एक गहरी सांत्वना थी,
एक निश्छल बंधन,
जो दीपक की तरह टिमटिमा कर
हर आने वाले दिन को रौशन करती रहेगी।

सुनीता तिवारी

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