Uncategorized

लिव-इन को खुली आज़ादी, शादी पर उम्र की बेड़ी — सामाजिक संतुलन तोड़ने वाले क़ानून पर सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी का तीखा सवाल

जब बालिग़ों को लिव-इन की इजाज़त है, तो उसी उम्र में निकाह और विवाह पर क़ानूनी बंदिशें क्यों बरक़रार हैं?

 

जयपुर। ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना क़ाज़ी सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह-उम्र के विरोधाभास पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि आज “बिना ज़िम्मेदारी वाले रिश्तों” को आसान और “ज़िम्मेदार रिश्तों” को मुश्किल बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब क़ानून दो बालिग़ों को साथ रहने और शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति देता है, तो उसी उम्र में निकाह/ विवाह पर रोक समाज और परिवार — दोनों के लिए हानिकारक है।

क़ाज़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब के अनुसार एक तरफ़ लिव-इन जैसे बंधनरहित रिश्तों को वैध और संरक्षित दर्जा मिल रहा है, वहीं निकाह/ शादी जैसे स्थिर और जवाबदेह रिश्तों पर उम्र की सख़्त पाबंदियां लगी हुई हैं। यह दोहरा मापदंड युवाओं को अस्थिर और असुरक्षित रिश्तों की ओर धकेलता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भरोसे और परवरिश का संकट पैदा कर सकता है।

*राजस्थान हाईकोर्ट के फ़ैसले का संदर्भ*

सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया आदेशों की ओर इशारा किया, जिनमें सभी लिव-इन रिश्तों के पंजीकरण और अनुबंध की व्यवस्था तथा बालिग़ (अठारह वर्ष से ऊपर) व्यक्तियों को, भले वे विवाह-उम्र तक न पहुंचे हों, लिव-इन में रहने की अनुमति पर ज़ोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि संविधान और न्यायपालिका का सम्मान अनिवार्य है, लेकिन कोई भी आदेश हराम को हलाल और नैतिक रूप से संदिग्ध चलन को सामाजिक मानक नहीं बना सकता। क़ाज़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने पूछा कि जब अदालतें लिव-इन के लिए अलग रजिस्ट्रेशन और सुरक्षा तंत्र बना रही हैं, तो उसी गंभीरता से निकाह/ विवाह की उम्र और नियमों की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही। “अगर राज्य सचमुच महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा चाहता है, तो उसे सबसे पहले स्थिर, क़ानूनी रूप से संरक्षित परिवार को मज़बूत करना होगा, न कि अस्थिर व्यवस्थाओं को आसान बनाना”।

*शरीअत और सामाजिक दृष्टिकोण*

क़ाज़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने कहा कि इस्लामी शरीअ़त निकाह को पवित्र, सुरक्षित और जवाबदेह रिश्ते का रास्ता मानती है और हर उस चलन का विरोध करती है जो युवाओं को बे-ज़िम्मेदारी और नैतिक गिरावट की ओर ले जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी अदालत या सरकार से नहीं, बल्कि उन व्यवहारों से है, जो पति-पत्नी और बच्चों की इकाई को कमज़ोर करते हैं और समाज की नैतिक रीढ़ पर चोट पहुँचाते हैं।

*ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन की अपील*

ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की है कि जिन बालिग़ युवाओं को क़ानून लिव-इन की खुली अनुमति देता है, उन्हें उसी उम्र में निकाह/विवाह की भी स्वतंत्रता और क़ानूनी सुरक्षा दी जाए। फ़ाउंडेशन का मानना है कि यदि 18 वर्ष के युवा अपने जीवन के बड़े फ़ैसले लेने में सक्षम माने जाते हैं, तो उन्हें स्थायी पारिवारिक ढांचा चुनने से रोकना न्यायसंगत नहीं है। संस्था ने सुझाव दिया कि विवाह-उम्र से जुड़े क़ानूनों की समीक्षा कर, ऐसी नीतियां बनें जो युवाओं को ग़ैर-ज़िम्मेदार रिश्तों की बजाय पंजीकृत, सुरक्षित और जवाबदेह निकाह/ विवाह की तरफ़ प्रोत्साहित करें, साथ ही जागरूकता और काउंसलिंग कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए।
क़ाज़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने अंत में कहा कि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन हर उस दिशा का समर्थन करेगा, जो समाज को स्थिरता, सुरक्षा और ज़िम्मेदारी की ओर ले जाए और हर उस रुझान का विरोध करेगा, जो युवाओं को हरामकारी और नैतिक गिरावट की तरफ़ ले जाता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!