माहवारी — सीमा शुक्ला चांद

माहवारी महिलाओं के लिए सुपरिचित शब्द और पुरूषों के लिए एक खोज का विषय है। यह एक प्राकृतिक व नैसर्गिक प्रक्रिया हैं जिसके कारण ही जीव का अस्तित्व इस दुनिया में कायम है। पन्द्रह सौलह वर्ष की आयु प्राप्त करने पर बच्चीयों की शारीरिक क्षमताओं का विकास होता है जिसमे गुप्तांगो का पूर्ण होना भी शामिल हैं। इस आयु की युवतियों को ईश्वर ने वो वरदान दिया है जिससे वो इस धरा में मनुष्य जाति का अस्तित्व बनाए रखने में योगदान देती है। हर माह पच्चीस से अठ्ठाईस दिन की कालवधि के पूर्ण होने पर महिलाओ में महावारी होती है। दरअसल इसे साधरण भाषा में माने तो प्रत्येक युवती का शरीर पच्चीस से अठ्ठाईस दिनों तक एक अंडे का निर्माण करता है और यदि ये अंडा पुरुष के शुक्राणु से नहीं मिल पाता तो यह खराब हो जाता है इस प्रक्रिया में हर माह महिला का ये अंडा रक्तस्राव के रूप में उसके गुप्तांग से बाहर आ जाता है और युवती का शरीर पुनः अंडे के सृजन कार्य में संलग्न हो जाता है।
सुनने में पड़ने में यह प्रक्रिया जितनी आसान लग रही है यह उतनी ही कठीन है इस प्रक्रिया के दौरान युवती के शरीर में कई हार्मोन उत्पन्न होते हैं और कई नष्ट होते हैं। जिसका प्रभाव उसके मानसिक शारिरीक स्तर पर भी पड़ता है। उसे कभी चिड़चिड़ापन कभी क्रोध कभी दर्द अलग अलग भावो से गुजरना पड़ता है। यह महावारी का समय लगभग पांच से सात दिनों का होता है। तो इस समय महिला को उसके गृह के अन्य सदस्यों के साथ की अत्याधिक आवश्यकता होती है।
एक ओर तो भारत में महिलाओं को इन दिनों अशुद्ध घोषित कर दिया जाता है दूसरी ओर कामाख्या मंदिर में मां के महावारी के दिनो के कपड़ों को पूजा योग्य मानकर अपने घर में पवित्र स्थान प्रदान किया जाता है। ये दोनों ही स्थितियों का अवलोकन यह बताता है की भारतीय नागरिक दोहरी मानसिकता रखता है जो कदापि सही नहीं है।
पुरातन काल में महावारी के समय में जो नियम बनाए गए थे वो महिलाओं को इन सात दिनों में सम्हालने के लिए निर्मित किए गए थे। हमारे पूर्वज ये जानते थे की यदि महिलाओ को सम्हालना है तो उन्हें कार्यमुक्त रखना पड़ेगा अन्यथा वे अपनी प्रकृति के अनुरूप कभी भी आराम नहीं कर पाएंगी। इसलिए पूर्वजों ने उन्हें घर के हर कार्य से मुक्त कर आराम करने का समय प्रदान किया। उनको दिया यह वरदान ना जाने कब धिरे धिरे कुरीति बन गया। कुछ ना समझ व्यक्तियों ने नारी के इस काल में जहां वो सृष्टि के सृजनकर्ता के रूप में कुछ शारीरिक मानसिक बदलावों से गुजर रही थी उसे अशुद्ध बता दिया। और उसे अत्याधिक मानसिक कष्ट प्रदान किया। उसे घर में एक नियत स्थान देकर इन सात दिनों के लिए कैद कर दिया। हमारे परिवार के सदस्यों का यह व्यवहार महावारी जो की वरदान है उसे अभिशाप बनाता चला गया। समाज से पृथक की गई महिला नकारात्मकता ओढ़ती चली गई जिसका प्रभाव उसकी उत्पादकता पर भी पड़ने लगा।
हमारे तांत्रिकों की मानें तो जब महिला राजस्वला होती है तो उनके लिए उस पर तंत्र मंत्र करना अत्याधिक आसान हो जाता है। ये माना गया है की माह के इन दिनों महिला का शरीर कमजोर होता है जिससे उसकी अच्छी शक्तियां कमजोर हो जाती है और नकारात्मक शक्तियां उस पर जल्द ही हावी हो जाती हैं। अतः इन गतिविधियों से बचाने के लिए भी महिलाओं को घर से बाहर ना निकलने की समझाइश दि गई थी। यौवना जो राजस्वला के प्रारंभ में होती थी उनके लिए उस रक्तस्राव को संभाल पाना भी कठिन होता था यह भी एक कारण था की उन्हे एक ही स्थान पर रहने को कहा जाता था। परन्तु म
पर समय के बदलाव के साथ साथ आज महिलाएं बहुत मजबूत हो गई। उनके पास रक्तस्राव को संभालने के विभिन्न साधन मौजूद हैं। वह स्त्री जो सृष्टि की जननी है उसका अशुद्ध कहलाना विचारणीय है। वर्तमान आधुनिक युग में प्रत्येक परिवार में स्त्रियों के इन दिनों में उनकी मानसिक शारीरिक स्थितियों को समझकर व्यवहार करने की नितांत आवश्यकता हैं। परिवार का सकारात्मक सहयोग महिलाओं को माह के उन दिनों में तभी प्राप्त होगा जब महावारी को भी सही रूप में घर की महिलाओं द्वारा परिवार के सभी नवजातों को बिना लिंग भेद के आसान भाषा में समझाया जाय। उनके प्रश्नो के सही उत्तर प्रदान किए जाएं। उन्हें कुत्ता छू गया कौआ चोंच मारी गया इन भ्रांतियो से मुक्त रखा जाए। माहवारी के विषय में पहले महिला स्वयं जागरूक हो फिर वो अपने परिवार को जागरूक करें। माहवारी शर्म का नहीं गर्व का विषय है ये महिला को सृष्टि के सृजनकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। आपको हम सभी को सृष्टि को बनाए रखने का जो अवसर मिला है उस पर सम्पूर्ण महिला समाज को गर्व होना अवश्यंभावी है
सीमा शुक्ला चांद




