शिकायत(कहानी) — कविता साव पश्चिम बंगाल

थाने के बरामदे में दो कुर्सियाँ आमने–सामने रखी थीं।
एक पर बैठी थी लड़की—सिर ढँका हुआ, आँखें सूजी हुईं, हथेलियों में पसीना।
दूसरी कुर्सी खाली थी, जैसे किसी निर्णय का इंतज़ार कर रही हो।
कुछ कदम दूर वह लड़का खड़ा था—
न अपराधी जैसा चेहरा,
न विद्रोही तेवर।
बस एक साधारण-सा युवक,
जिसने केवल प्रेम करना सीख लिया था।
मेज़ पर रखे काग़ज़ की हेडिंग थी—
“शिकायत”
और शिकायत किसकी थी?
उसी प्रेम की,
जिसने दो दिलों को एक-दूसरे की धड़कन पहचानना सिखाया था।
“किसके ख़िलाफ़ शिकायत है?”
थानेदार ने बिना नज़र उठाए पूछा।
लड़की की आवाज़ गले में अटक गई।
कुछ पल बाद शब्द निकले—
“अपने… अपने प्रेमी के ख़िलाफ़।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
माँ की सिसकियाँ उस सन्नाटे को चीर रही थीं।
पिता की आवाज़ कठोर थी—
“बहला-फुसलाकर ले गया है हमारी बेटी को।”
लड़की ने पहली बार साहस जुटाया।
उसने सिर उठाया,
और कहा—
“नहीं, पापा…
मैं कोई चीज़ नहीं हूँ जिसे कोई ले जाए।
मैं इंसान हूँ।
मैंने खुद चुना है।”
उस एक वाक्य में
बरसों की चुप्पी टूट गई।
लड़का आगे बढ़ा।
हाथ जोड़कर बोला—
“साहब, हमने कोई ग़लत काम नहीं किया।
हम बालिग हैं।
हमने सिर्फ़ एक-दूसरे से प्यार किया है।”
थानेदार ने काग़ज़ पलटा।
क़ानून की भाषा साफ़ थी—
कोई अपराध नहीं।
लेकिन समाज का क़ानून?
वह काग़ज़ों में नहीं लिखा जाता।
लड़की की माँ फूट पड़ी—
“लोग क्या कहेंगे?
बेटी, हमारा सिर झुक जाएगा!”
लड़की की आँखों से आँसू गिरे,
लेकिन आवाज़ मज़बूत थी—
“माँ,
अगर मेरा सच स्वीकार करना
सिर झुकाना है,
तो यह झुकना मुझे मंज़ूर है।”
उसने थरथराते हाथों से
शिकायत वाला काग़ज़ लिया।
कुछ देर देखा।
फिर बोली—
“यह शिकायत मेरी नहीं थी।
यह डर की थी।
समाज के तानों की थी।”
काग़ज़ फाड़ दिया गया।
थाने के बाहर धूप तेज़ थी।
मामला निपट चुका था।
पर लड़की जानती थी—
असली लड़ाई अब शुरू होगी।
घर की चौखट पर,
रिश्तों की अदालत में,
हर रोज़ सवाल होंगे—
ताने होंगे,
खामोशियाँ होंगी।
लड़के ने धीरे से कहा—
“अगर तुम चाहो तो मैं पीछे हट जाऊँ…”
लड़की ने उसकी ओर देखा।
हल्की मुस्कान आई।
बोली—
“नहीं।
अब शिकायत करना नहीं,
साथ खड़ा होना सीख लिया है।”
शिकायत थाने से हटी थी,
लेकिन समाज के दिमाग़ से नहीं।
फिर भी—
उस दिन
दो दिलों ने
डर के ख़िलाफ़
एक छोटी-सी जीत दर्ज कर ली थी।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




