ठंड का कहर– सुनीता तिवारी

उस साल ठंड कुछ ज़्यादा ही बेरहम होकर आई थी।
कोहरे की मोटी चादर ने पूरे गाँव को अपने आगोश में ले लिया था।
सूरज जैसे रास्ता भटक गया हो,कई दिनों तक दिखाई ही नहीं दिया।
गलियों में सन्नाटा और घरों में सिमटे लोग ठंड से बचने की जद्दोजहद में लगे थे।
गाँव के किनारे रहने वाली बूढ़ी काकी, शांति देवी, इस ठंड की सबसे बड़ी मार झेल रही थीं।
टूटी-फूटी झोपड़ी, पुरानी रजाई और बुझता चूल्हा
यही उनकी दुनियां थी, हर सुबह ठिठुरते हाथों से आग जलाने की कोशिश करतीं, पर ठंड मानो उनकी हिम्मत से होड़ कर रही थी।
एक रात ठंड ने अपना असली कहर दिखाया।
बर्फ़ीली हवा झोपड़ी की दरारों से भीतर घुस आई।
काकी की कंपकंपी बढ़ती जा रही थी।
पास-पड़ोस के लोग भी अपने-अपने घरों में दुबके थे।
मदद की पुकार सुनने वाला कोई नहीं था।
उसी रात स्कूल से लौटता दसवीं कक्षा का छात्र रवि, काकी की झोपड़ी के पास रुका।
अंदर से आती खाँसी और कराह उसकी संवेदना को झकझोर गई।
बिना देर किए वह घर भागा और अपने पिता को साथ लेकर काकी के पास पहुँचा।
गाँव के कुछ और लोग भी जाग गए। किसी ने अलाव जलाया, किसी ने गर्म दूध दिया,तो किसी ने अतिरिक्त कंबल।
धीरे-धीरे काकी की साँसें सामान्य हुईं।
उस रात ठंड हार गई और इंसानियत जीत गई।
अगली सुबह सूरज बादलों को चीरकर निकला।
ठंड तो अब भी थी, पर लोगों के दिलों में गर्माहट आ चुकी थी।
गाँव ने तय किया कि आगे से कोई भी ठंड में अकेला नहीं रहेगा।
कहते हैं, ठंड शरीर को जमा सकती है,पर संवेदना की आग हर कहर को पिघला सकती है।
सुनीता तिवारी




