रसोई की आग पर मंडराता संकट: गैस सिलेंडर की कमी के पीछे युद्ध, मुनाफाखोरी या नीतिगत कमजोरी — राजेश सिंह हाड़ा
रसोई में जलती हुई आग केवल भोजन नहीं पकाती, वह घर की व्यवस्था, परिवार की दिनचर्या और आम आदमी की आर्थिक स्थिति को भी संतुलित रखती है। लेकिन जब उसी रसोई की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता एलपीजी गैस सिलेंडर संकट में पड़ने लगे, तब यह केवल एक घरेलू समस्या नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चिंता का विषय बन जाती है। आज देश के कई हिस्सों में गैस सिलेंडर की उपलब्धता को लेकर लोगों के मन में असमंजस और चिंता दिखाई दे रही है। कहीं देर से डिलीवरी, कहीं कीमत बढ़ने की आशंका, तो कहीं कृत्रिम कमी की चर्चा। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर इस संकट के पीछे वास्तविक कारण क्या है? मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव, विशेषकर ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष, वैश्विक ऊर्जा बाजार को सीधे प्रभावित कर रहा है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और एलपीजी की आपूर्ति में भी मध्य-पूर्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब युद्ध या सैन्य तनाव के कारण समुद्री मार्ग असुरक्षित होते हैं, तब तेल और गैस के जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, जिसका असर सीधे आपूर्ति और कीमतों पर है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी अस्थिरता भी भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चिंता का कारण बन जाती है। लेकिन क्या केवल युद्ध ही जिम्मेदार है? यदि गहराई से देखा जाए तो संकट के समय बाजार में मुनाफाखोरी भी एक बड़ा कारण बन जाती है। जैसे ही कमी की आशंका फैलती है, कुछ स्थानों पर जमाखोरी शुरू हो जाती है। उपभोक्ता घबराकर पहले से अधिक बुकिंग करने लगते हैं, और कुछ बिचौलिये स्थिति का लाभ उठाकर अतिरिक्त कीमत पर सिलेंडर उपलब्ध कराने की कोशिश करते हैं। यह स्थिति कृत्रिम संकट पैदा करती है, जिससे वास्तविक समस्या और अधिक गंभीर दिखाई देने लगती है। सरकारी नीतियों पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। भारत में ऊर्जा सुरक्षा पर लंबे समय से चर्चा होती रही है, फिर भी घरेलू गैस उत्पादन अभी भी इतनी मात्रा में नहीं बढ़ पाया कि आयात पर निर्भरता कम हो सके। यदि किसी वैश्विक संकट का असर सीधे आम नागरिक तक पहुंच रहा है, तो इसका अर्थ है कि हमारी दीर्घकालिक तैयारी अभी भी पर्याप्त मजबूत नहीं है। ऊर्जा भंडारण, वैकल्पिक स्रोतों का विस्तार और वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता ये तीनों क्षेत्र अभी भी मजबूत सुधार की मांग करते हैं। वास्तविकता यह है कि यह संकट किसी एक कारण से उत्पन्न नहीं हुआ। युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर दबाव बनाया, मुनाफाखोरी ने स्थिति को और बिगाड़ा, और नीतिगत सीमाओं ने आम नागरिक को असुरक्षित महसूस कराया। इसलिए दोष केवल एक पक्ष पर डालना उचित नहीं होगा।समाधान स्पष्ट है भारत को ऊर्जा के स्रोतों में विविधता लानी होगी, घरेलू उत्पादन बढ़ाना होगा, रणनीतिक भंडारण मजबूत करना होगा और जमाखोरी पर कठोर कार्रवाई करनी होगी। साथ ही बायोगैस, सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक कुकिंग जैसे विकल्पों को तेज़ी से प्रोत्साहित करना समय की आवश्यकता है। आज आवश्यकता केवल गैस उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि ऐसी ऊर्जा नीति बनाने की है जिसमें दुनिया के किसी भी युद्ध की आग भारतीय रसोई तक न पहुंचे। क्योंकि जब रसोई असुरक्षित होती है, तब सबसे पहले प्रभावित होता है आम नागरिक का विश्वास।
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