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बाल सृजन की सरस सरिता में अविरल प्रवाहित कल्पकथा की साहित्य-साधना का २४२वाँ सोपान।

 

प्रभु श्री राधा गोपीनाथ जी महाराज की कृपा से संचालित राष्ट्र प्रथम, हिन्दी भाषा, सनातन संस्कृति, एवं सद साहित्य हेतु कृत संकल्पित कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार की संवाद प्रभारी श्रीमती ज्योति राघव सिंह ने बताया कि साहित्य साधना के पावन पथ पर अग्रसर संस्था के तत्वावधान में २४२वीं साप्ताहिक ऑनलाइन काव्यगोष्ठी का आयोजन अत्यंत हर्ष, उल्लास एवं साहित्यिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ।

यह काव्यगोष्ठी नवोदित बाल सृजनकारों एवं प्रबुद्ध साहित्यकारों के समन्वित स्वर से अनुप्राणित रही, जिसमें भाव, भाषा और अभिव्यक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला।कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत गुरु वंदना, गणेश वंदना एवं सरस्वती वंदना के दिव्य उच्चारण से हुई, जिसने सम्पूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक आभा से आलोकित कर दिया।

गरिमामयी आयोजन का सुचारु एवं प्रभावी संचालन दीदी राधा श्री शर्मा द्वारा अत्यंत स्नेह, संतुलन एवं साहित्यिक सौष्ठव से स्पंदित रहा इस अवसर पर देश के विभिन्न अंचलों से जुड़े बाल प्रतिभागियों—कु० आप्या जैन, कु० प्रकृति वर्मा, कु० आकांक्षा दुबे, कु० अद्विका द्विवेदी, अम्बरीष मिश्र, आरुष शर्मा, कु० गरिमा मिश्रा, कु० दिया मिश्रा, कु० राशि मिश्रा, कु० नीति मिश्रा एवं नैतिक मिश्र ने अपनी कोमल किंतु प्रभावपूर्ण अभिव्यक्तियों से श्रोताओं के हृदय को स्पंदित कर दिया। उनकी रचनाओं में बालमन की सहजता, संवेदनाओं की सरसता एवं राष्ट्र-धर्म के प्रति जागरूकता का अनुपम समावेश दृष्टिगोचर हुआ।

साथ ही वरिष्ठ साहित्यकारों एवं गणमान्य प्रतिभागियों में, पं. अवधेश प्रसाद मिश्र मधुप, अमित पंडा अमिट रोशनाई, अतुल कुमार खरे, डाॅ. श्याम बिहारी मिश्र, विजय रघुनाथराव डांगे, पवनेश मिश्र की सृजनधर्मिता ने गोष्ठी को और अधिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनके अनुभवी काव्यपाठ ने न केवल साहित्यिक वातावरण को समृद्ध किया, बल्कि नवांकुरों के लिए प्रेरणा का अमूल्य स्रोत भी प्रदान किया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में राष्ट्रभक्ति की भावधारा को सजीव करते हुए राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम्” का सामूहिक गायन किया गया, जिसने सम्पूर्ण वातावरण को देशप्रेम की अनुपम ऊर्जा से अभिसिंचित कर दिया। अंततः आयोजन के समापन पर संस्था परिवार की ओर से आमंत्रित अतिथियों, समस्त सहभागी साहित्यकारों एवं दर्शक श्रोताओं के प्रति हार्दिक आभार एवं कृतज्ञता ज्ञापित की गई। यह काव्यगोष्ठी न केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति का मंच बनी, बल्कि संस्कार, संस्कृति और सृजनशीलता के समन्वय का एक प्रेरणादायी उदाहरण भी प्रस्तुत कर गई।

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