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संगीत: आत्मा का स्पन्दन और जीवन का आधार – -डॉ.दक्षा जोशी अहमदाबाद, गुजरात।

 

संगीत केवल सात सुरों का संगम नहीं, बल्कि वह सूक्ष्म धागा है जो मानव अस्तित्व के भौतिक और आध्यात्मिक छोरों को जोड़ता है। यदि भाषा तार्किक अभिव्यक्ति है, तो संगीत भावनात्मक सत्य है। मानव जीवन पर इसके प्रभाव को मात्र मनोरंजन की परिधि में बांधना इसके विराट स्वरूप के साथ अन्याय होगा।
मनोवैज्ञानिक एवं बौद्धिक प्रभाव:
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो संगीत मस्तिष्क के ‘लिम्बिक सिस्टम’ को सक्रिय करता है, जहाँ हमारी भावनाएँ और स्मृतियाँ निवास करती हैं। यह तनाव के समय कॉर्टिसोल को कम कर डोपामाइन का संचार करता है। एक तार्किक पक्ष यह भी है कि शास्त्रीय संगीत की जटिल संरचनाएँ गणितीय प्रतिमानों (Mathematical patterns) पर आधारित होती हैं, जो श्रोता की एकाग्रता और संज्ञानात्मक क्षमता (Cognitive ability) को प्रखर बनाती हैं।
भावनात्मक और सामाजिक सामंजस्य:
मार्मिक स्तर पर, संगीत वह मरहम है जो उस पीड़ा को स्वर देता है जिसे शब्द व्यक्त करने में असमर्थ रहते हैं। यह एकाकीपन का साथी है और उत्सवों की ऊर्जा। जब हजा़रों लोग एक ही लय पर झूमते हैं, तो वहाँ व्यक्तिगत अहंकार विलीन हो जाता है और केवल एक सामूहिक चेतना शेष रहती है। संगीत भौगोलिक और भाषाई सीमाओं को लांघकर ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को चरितार्थ करता है।
आध्यात्मिक उत्कर्ष:
दार्शनिक रूप से, संगीत ‘नाद ब्रह्म’ का मार्ग है। यह अंतर्मन के कोलाहल को शांत कर व्यक्ति को स्वयं के केंद्र से मिलाता है। एक मधुर धुन मनुष्य को भौतिक जगत से ऊपर उठाकर उस परमानंद की अनुभूति कराती है, जहाँ तर्क़ मौन हो जाता है और केवल बोध शेष रहता है।
संगीत वह मौन संवाद है जो सीधे हृदय से टकराता है। यह जीवन की नीरसता में रस घोलने वाला वह अनिवार्य तत्त्व है, जिसके बिना मानव सभ्यता भावनात्मक रूप से पंगु हो जाती। संगीत जीना सिखाता है, सहना सिखाता है और सबसे बढ़कर, होना सिखाता है।

-डॉ.दक्षा जोशी
अहमदाबाद, गुजरात।

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