सूर्यास्त के साथ एक अधूरा पत्र उन रिश्तों के नाम, जो धुंध में खो गए – नरसा राम जांगु

आज शाम…
सूरज डूब रहा है। उसकी आखिरी किरणें मेरे आंगन में बिखरी हैं, ठीक वैसे ही जैसे मेरे दिल में बिखरी हैं उन रिश्तों की यादें।
मेरी कलम आज उन रिश्तों पर चल रही है, जिनको निभाने के लिए मैंने जीवन में क्या नहीं किया। अपना वक्त दिया, अपनी नींद दी, अपना सुख दिया, अपनी हँसी दी। जब उन्हें जरूरत थी, तो मैं दीवार बनकर खड़ा रहा। जब वो गिरे, तो मैंने अपना कंधा दिया। मैंने कभी हिसाब नहीं रखा कि मैंने कितने एहसान किए, क्योंकि मेरे लिए वो एहसान नहीं, मेरा फर्ज, मेरा किरदार, मेरा प्रेम था।
पर आज…
आज जब मेरी ही जीवन की नाव थोड़ी डगमगा रही है, जब मेरी परिस्थितियाँ कुछ समय के लिए विपरीत हैं, तो वही धागे, जिन्हें मैंने इतनी मजबूती से बुना था, मुझसे दूरियाँ बना रहे हैं।
वो सब जानते हैं… वो जानते हैं कि मैंने उनके लिए क्या-क्या किया है। मेरे किरदार से, मेरे एहसानों से वो भली-भांति अवगत हैं। फिर भी आज वो मुझे और अधिक तोड़ने में लगे हैं।
और मैं यहाँ, इस डूबते सूरज को देखकर, खुद से एक ही सवाल पूछ रहा हूँ…
क्या वास्तव में वो मुझे भूल चुके हैं?
क्या किसी अपने के बुरे वक्त में उसे छोड़ देना सही है?
क्या एहसान, फर्ज और प्रेम से बंधे रिश्तों का यही अंजाम होता है?
—
फिर भी, मैं टूटा नहीं हूँ।
क्योंकि मैं जानता हूँ, यह सूर्यास्त अंत नहीं है।
यह सूर्य मुझे सिखा रहा है कि डूबना भी एक कला है, ताकि फिर से उगना आ सके।
अंधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, कल सुबह फिर से सूरज निकलेगा।
मेरी परिस्थितियाँ आज विपरीत हैं, पर हमेशा नहीं रहेंगी।
जो रिश्ते धुंध में खो गए, उन्हें मैं अलविदा कहता हूँ, कोई शिकवा नहीं।
और जो एक-दो दीये अभी भी मेरे नाम के जल रहे हैं, मैं उनके सहारे कल की सुबह का इंतजार करूँगा।
उम्मीद नहीं छोड़ी है, बस रिश्तों की परिभाषा समझ रहा हूँ।
शुभ संध्या… कल फिर मिलेंगे, एक नई सुबह, एक नई उम्मीद के साथ।
लेखक
नरसा राम जांगू




