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संस्मरण— ऐसा रंग चढ़ा — भोला सागर

 

कई होली बीत गई। आये वर्ष होली की मस्ती में डूबते गये। संगी-साथियों के संग भांग खाकर होली खेलते रहे। भौजाइयों को भी खूब रंग-अबीर लगाये। वो भी हमें रंगों से तराबोर कर देतीं। सुबह दस बजते-बजते कादो-कीचड़ से सनाकर सभी भूत हो जाते। कोई पहचान नहीं पाते कि ये अमुक अमुक है। सब इतने कादो-माटी में गड़ा जाते थे। जिस-तिस पर तो कोई मोबिल भी डाल देता। गोबर को घोटर कर भी डाल दिया जाता था।बारह-एक बजे दिन तक ऐसा ही सिलसिला चलता रहता था।

तब की होली गजब ही होती थी। लोग गुस्साते भी नहीं थे। कितनों के कपड़े फाड़ दिये जाते थे। होली तो भाई
होली है। बहुत कम बवाल मचता था। क्योंकि उस समय शराब का नशा करके रंग नहीं खेलते थे। इसी में ज़्यादेतर झगड़ा-फसाद होता है। आज झगड़ों का मूल कारण यही है।

फिर बुजुर्गों की कीर्तन टोली में मैं धीरे-धीरे शामिल भी होने लगा। हल्का-फुल्का ढोल बजाने लगा। समय बीतता गया। मैं भी कीर्तन में रमता गया। अब तो मेरी मंडली में युवाओं का ही समूह बन गया।

अब कीर्तन का #ऐसा रंग चढ़ा कि कीर्तन मंडली के वगैर न मैं रह पाता न मेरी मंडली के अन्य सदस्य। मेरी अनुपस्थिति भी मंडली को काफी खलती है।

भोला सागर
चन्द्रपुरा बोकारो,झारखण्ड

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