लघु कथा – स्वाभिमान — डॉ० रश्मि अग्रवाल रत्न’
रमेश जी की कपड़े की दुकान थी । दुकान के सामने ही एक दर्जी मोहन अपनी मशीन से लोगों के सिलाई खुले कपड़ो की और सिलाई खुले जींस की मरम्मत कर दिया करता था । अन्य कपड़े भी जो कोई ला कर दे दे उन्हें सिल देता था । इसी की कमाई से उस के घर का खर्च चलता था । एक दिन रमेशजी ने देखा कि मोहन का बेटा आया और फीस जमा करने के लिए रुपया माँगने लगा ।मोहन ने कहा !अभी मेरे पास रुपए नहीं हैं । आज कोई कपड़े सिलाई करवाने नहीं आया । जब रुपया मिलेगा मैं तुम्हें फीस जमा करने के लिए दे दूँगा ।रमेश ने अपने दुकान में काम कर रहे चंदू को बुलाया और कुछ पुराने कपड़े फाड़ कर चंदू को दे दिए और कहा जा कर सामने बैठे दर्जी से सिलाई करवा कर ले आओ और जितना माँगे उसको पैसे दे देना ।
चंदू गयाऔर जा कर मोहन से सिलाई करवा कर कपड़े ले आया मोहन ने जितने भी पैसे माँगें थे ।बिना मोल – भाव किए उसे दे दिया । दूसरे दिन यही सिलसिला फिर चला ।रमेश जी ने पुराने कपड़े फाड कर चंदू को दिया और चंदू मोहन से सिलवा कर ले आया । तीसरे दिन जब चंदू पुराने कपड़े जो सेठ जी ने फाड़े थे । उन्हें सिलवाने ले जाने लगा तो सेठ जी से उसने पूछा, साहब ! इन कपड़ों की तो जरूरत भी नहीं है, .यह पुराने कपड़े हैं । इन्हें आप बार – बार क्यों सिलवा रहे हैं । इस पर रमेश जी ने कहा । मैं मोहन की मदद हेतु ऐसा करता हूँ । वह बहुत स्वाभिमानी है । वह किसी से भी माँग कर पैसे नहीं लेगा । रोज की कमाई से उसके घर का खर्च चलता है ।आज कोई उससे अपने कपड़े सिलवाने नहीं आया आज उसकी बोहनी नहीं हुई है और मैं नहीं चाहता कि उसका परिवार भूखा रहे या उसके बच्चे की फीस जमा न हो पाए इसलिए मैं अपनी तरफ से उसकी मदद कर रहा हूँ । उसका स्वाभिमान कायम रहे, इसीलिए मैं कपड़े रोजाना उसको भेजता हूँ । जिस दिन कोई भी उसे कपड़े सिलवाने नहीं आता उस दिन मैं ज्यादा कपड़े भेजता हूँ । यह सुनते ही चंदू की आँखों से आँसू गिरने लगे । वह अपने सेठ जी के समक्ष नतमस्तक हो गया । सेठ जी कितने भले इंसान हैं यह उसे बोध हो चुका था ।
डॉ० रश्मि अग्रवाल रत्न’



