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संस्मरण , सिद्धांतवादी एक ऑटोवाला — पल्लवी राजू चौहान

आज सवेरे सवेरे जब मैं स्कूल में मीटिंग के लिए जा रही थी, तब मैंने एक ऑटो रिक्शावाले को देखा। मैं उस ऑटो रिक्शावाले के पास बढ़ रही थी कि उसके सामने दूसरा ऑटो रिक्शावाला सामने आ गया। मैंने उस ऑटो रिक्शा वाले को आवाज़ दी, तो वह तुरंत मुझे मंजिल तक पहुंचाने के लिए तैयार हो गया। मैं जैसे ही उस ऑटो में बैठी, वह व्यक्ति हंसते हुए बोल पड़ा, “मैम, मैंने आपको ऑटो में बिठाया, तो दूसरा ऑटो वाला की मुझसे नाराज़ हो गया। आप शायद उसकी ओर बढ़ रहीं थी,पर मैं बीच में आ गया। जिसकी वजह से आपने मुझे आवाज़ दे दी और मैंने तुरंत ही आपकी सवारी के लिए हामी भर दी।” मैं चुपचाप मुसकुराते हुए उसकी बातें सुन रही थी। वह एक सांस में अपनी बातें कहते जा रहा था। उसने कहा, जानते हैं मेम, मैं आपकी बात से समझ चुका था कि ये सवारी ज्यादा लंबी नहीं जाएगी, लेकिन फिर भी मैंने हाँ कह दी, क्योंकि जिसतरह से आपने मुसकुराते हुए मुझे आवाज़ दी, तो मुझे बहुत अच्छा लगा। भले ही मुझे सवेरे १५० या २०० का फायदा न हो रहा हो, लेकिन फिर भी एक ग्राहक को खुश देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है।” तब मैंने हंसते हुए कहा, “यह तो बहुत अच्छी बात है।” उसके बाद भी वह रुका नहीं और बोलता ही गया वह चुप रहने का नाम ही नहीं ले रहा था और बोलता गया। अब वह अपनी फैमिली लाइफ के बारे में बात करने लगा और बोला, “मेम! मेरी पत्नी को हर रोज मैं ५०० रूपये देता हूँ। मेरी जब से शादी हुई है मैं आज तक हर रोज देता हूँ। यदि एक दिन भी मैं उसे नहीं दूंगा, तो वह उदास हो जाती है और उदास हो जाती है।” तब मैंने उससे कहा, “यदि किसी कारण से धंधा नहीं होगा, तो आदमी कहाँ से देगा।” नहीं मैम बुरा मत मानिएगा, “मेम! अगर मैं उसे ५०० नहीं दूंगा, तो वह घर कैसे चलाएगी।” दो तीन बच्चों का हर रोज का खर्चा वह कैसे उठाएगी, इसीलिए वह हर रोज मुझसे हर रोज ५०० रूपये लेती ही है और मैं भी अपना फर्ज निभाता हूँ। कभी कभार अगर ४०० देता हूँ तो पूछती है कि कहाँ पर खड़े होकर दोस्तों से बात कर रहे थे। सवारी क्यों नहीं ली।” यह बात सुनकर मैं हँस पड़ी और बोली, “ बाप रे! आपको इतना टाइट करके रखती है।” वह फिर आगे बोल पड़ा, “ हाँ, क्या करें उसे अगर एक दिन ४०० देता हूँ, तो उसे ये वादा करता हूँ कि अगले दिन तुझे ६०० दूंगा। बस इतना कहते ही वह खुश हो जाती है।” मैंने हँसकर कहा, यह तो बहुत अच्छी बात है, आप अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाते हैं, लेकिन पत्नी का भी फ़र्ज़ होता है कि वह बुरे वक्त में अपने पति का साथ थे। वह मेरी बातों को काटते हुए कहता है कि बुरा मत मानिएगा, मेम! अगर मैं उसे हर रोज़ का खर्च नहीं दूंगा तो वह घर खर्च कैसे चलाएगी। वरना मुँह फुलाकर घर में घूमती रहेगी और मैं यह नहीं चाहता। मैं उसे हमेशा खुश देखना चाहता हूँ। आज तक मैं उसे उसके सिर पर मस्ती में भी हल्के से हाथ नहीं मारा है। मैं उसकी इज़्ज़त करता हूँ, क्योंकि वह अपना पत्नी धर्म पूरा निभाती है।” मैं यह सुनकर हँस पड़ी और बोली, “आप तो बहुत सिद्धांतवादी है, अच्छा है। ऐसी सोच आजकल कहाँ देखने के लिए मिलती हैं।” उसी वक्त मेरा स्कूल आ गया और मैं उतरने लगी, तो वह हँसते हुए बोला, “ आप जैसे हंसती हैं, वैसे ही हँसते रहिएगा और भाईसाहब को कभी तकलीफ मत दीजिएगा।” तब मैंने हँसते हुए कहा, “रूपये पैसे को लेकर हमारा कभी झगड़ा नहीं होता। हमारी आपसी अंडरस्टैंडिंग बहुत अच्छी है।” मैंने उसको भाड़ा दिया और वह मुझे नमस्ते करते हुए चला गया। यह पांच से सात मिनट में वह व्यक्ति अपनी पूरी कहानी मुझे एक साँस में कह गया और मैं चुपचाप सुनती गई। इस बात से तो मैं यह समझ पाई कि हर व्यक्ति की अपनी एक जीवनशैली होती है, हर किसी के जीने का तरीका होता है। कम पैसे में भी लोग अपना जीवन किसतरह खुशी खुशी बीता लेता है। एक गरीब ऑटोवाला भी अपना जीवन किसतरह व्यवस्थित रूप में जीता है। यही जीवन है उस गरीब ऑटो रिक्शावाले से भी मुझे कुछ सीख मिली है। आपके पास जितना हो उसी में खुश रहें, यही जीवन का मूल मंत्र है। यह खुशमिजाज़ ऑटोवाला जाते जाते सीख देता गया और जीने का तरीका सिखाते हुए गया। हम आज भी ईमानदारी से बगैर झगड़ा-झंझट और क्लेश के अपनी गृहस्थी के जीवन को चला सकते हैं। लेखिका: पल्लवी राजू चौहान
कांदिवली, मुंबई

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