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बाढ़ की त्रासदी — लता शर्मा तृषा

 

अभी वर्तमान में अति वृष्टि,बादल फटने से बहुत से जगहों में तबाही मची हुई है लोग धन जन दोनों से त्रास में डूबे हुए हैं मैंने इस तरह की त्रासदी अपने बचपन में अपने गांव में अक्सर देखा है।

मेरा गाँव शिवनाथ नदी के तट पर बसा है बरसात के दिनों में गांव टापू बन जाता एक तो नदी की बाढ़ उसपर बड़े छोटे नाले गाँव को घेर लेते तो पानी के अलावा और कुछ न दिखता।उन दिनों घर प्रायः मिट्टी के खप्पर वाले होते , गरीबों के तो छप्पर घास फूस के ।
हमलोग वहाँ के गौंटिया थे हमारा पत्थरों से बना घर दो मंजिला बहुत बड़ा सा था पिताजी सभी भाई साथ ही रहते एक चुल्हा ही जलता । जब बाढ़ बढ़त गलियों में पानी तीन चार फीट बहने लगती ,नदी में पेड़ पौधे ,जानवर सांप वगैरह बहते सहज देखें जाते,कच्चे घरों के दीवार ढह जाते छप्पर बह जाते ।
हालांकि नदी में बढ़ते बाढ़ को देखकर दादाजी, पिताजी सारे मवेशियों व गरीब परिवारों को गांव से बाहर सुरक्षित स्थान (अन्य गांव में बने हमारे बाड़े )में भेज देते थे ।कई लोग हमारे घर में सर छुपाते। कितना भयंकर स्थिति होती तब सारे संपर्क शहर से कटे रहते सब्जी भाजी आदि सामग्रीयों से वंचित।

लता शर्मा तृषा

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