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प्रकाश पुंज की किरणें — जगदीश कौर प्रयागराज

 

एक था प्रकाश पुंज उसकी चार किरण।
साहस, निडर , मानवीय मूल्यों का सम्मिश्रण।
चांद से निर्मल ,सौम्य और शीतल।
सूरज से ऊर्जावान ,गंभीर और निष्फल।।
छोटी सी उम्र में वो काम कर गए।
इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में नाम कर गए।।
बाबाअजीत,जुझार,जोरावर और फतेह।
किसी को उनके बाबा होने का नही रहा संदेह।।

अजीत सिंह जी नाम के थे अजीत।
मुगल भी जाने सकता उनको कोई न जीत।
बड़े दलेरी से लड़े चमकौर की जंग में।
रंगे हुए बचपन से अकाल के रंग में।।
अदम्य साहस, जोश देख घबराई फौज थी।
भंवर में कस्ती की अलग ही मौज थी।।
कईयों को मार के वो सूरमा हुआ शहीद।
युद्ध हो जाएगा खत्म दुश्मन की थी उम्मीद।

बाबा जुझार सिंह बोले पिता से आज्ञा दे।
मेरी तेग में कितना जोश उनको दर्श करा दे।
पिता ने बोला बेटा यह तुम्हारा पहला युद्ध है।
जुझार बोले दिखाऊंगा खालसे का इरादा शुद्ध है।
पिताजी युद्ध में रणबांकुरों की तरह लडूंगा।
सामने से ही वार मै खा के मरूंगा।।
तेग का पोता और गोबिंद का लाल हूं।
जुझार नाम है,मै वीरों का ज्वाल हूं।।

पिता से आशीष ले बाँकुरा रण में टूट पड़ा।
अदम्य निडरता देख दुश्मन असमंजस में पड़ा।।
सीने में वार खा वो वीर जब गिर गया।
आनंद में फिर पिता का जैकारा गूंज गया।।
गोबिंद ने फिर अकाल का शुक्राना किया।
जो तेरा था आज वो तुझे मैने अर्पण किया।।
जोरावर , फतेह सिंह,माता गुजरी है इधर।
सरहिंद, सर्द हवाओं का कहर है जिधर।

लालच ,मोह,फिर कष्टों का सिलसिला शुरू हुआ।
9,7 साल के साहिबजादों का इरादा नही हिला।।
जालिमों ने हर एक चाल थी चल ली।
झुकाने,डराने,धमकाने की राह पकड़ ली।।
यातनाओं के साथ उनके इरादें और हुए प्रखर।
शब्द गुरु और इतिहास सुन के बने निडर।।
जालिमों से बोले हमने अब जपूजी भी पढ़ ली।
दादा तेग से मिलने की अब हमें हो रही जल्दी।

तुम्हारी यातनाओं, कष्टों से हम नही डरते।
गोबिंद के बेटे है जीते जी आत्मिक मौत नही मरते।।
दीवार चुनती तो जोरावर के अश्रु निकल आए।
फतेह बोल उठे क्या भाई मौत से घबराएं।
मौत से कौन डरता छोटे उसकी मुझको भी जल्दी।
मेरे बाद आए और पहले जा बैठोगे दादे की गोदी।
खैर तुम जा रहे हो तो तो मेरी भी फतेह बुलाना।
मै भी आ रहा हूं पीछे मेरा पैगाम दे देना।।

जोरावर नाम के अनुरूप बलवान और दृढ़।
वाकपटुता, बुद्धिमानी में बड़े भाइयों के सदृश।।
फतेह सिंह की कुशलता, बोधगम्यता को देख।
बचपन में बुढ़ापे सी माथे में थी रेख।।
बच्चे नही वो हर पक्ष में थे पूरे बाबा।
गूंजते जैकारे मंदिर गुरुद्वारा,चर्च और काबा।।
मां गुजरी की सीख, इतिहास से मिली सीख।
वाणी की शिक्षा से बन गए वो दीर्घ।।
जगदीश कौर प्रयागराज

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