बचपन के यादगार लम्हे — राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

सबसे सुंदर और यादगार पल बचपन के ही हो सकते हैं। अनवरत खेलते कूदते, मौज-मस्तियां करते नहीं थकते हैं।एक अलौकिक आनंद और सुन्दर एहसासों
से परिपूर्ण ये बचपन भला कौन भुला सकता है। मां का लाड़ प्यार दुलार कभी कभी डांट फटकार सब अब बहुत याद आती है और याद आते हैं,, उस ज़माने के बच्चों के खेल निराले,,कभी बारिश में काग़ज़ की नाव चलाना। कभी गुल्ली-डंडा खेलते, कभी सतोलिया खेलते, रंग बिरंगे कांच के कंचों से खेलना,कभी इंजन और रेल का छुक छुक खेल, बेफ़िक्री से ताल तलैया में कूद कूद कर नहाना। कभी खेत में तो कभी नदी तट की रेत में सपनों के घर बनाना। लड़ना झगड़ना और फिर थोड़ी में कट्टी से बट्टी होकर फिर सब कुछ भूलकर साथ साथ खेलना। भाई बहन का लड़ना झगड़ना और मां के पीछे छुप जाना। मां का नाराजगी दिखाना और फिर हंसकर गले लगाना सब, अब बहुत याद आता है। मां के मना करने पर भी दोस्तों संग आम अमरूद के बाग से फल चुराना और जरा सी आहट पर सरपट भाग जाना। याद आती हैं वो गांव की गलियां
खेतों में मूंग चंवले की फलियां। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर पैदल चलना।हरी भरी और लहलहाती फसलों का हवाओं संग लहराना।गांव की धूल, सरसों के पीले पीले फूल, गेहूं की बालियां,पणिहारियों की लालियां बहुत याद आती है। मेले की सैर और चकरी झूलों में झूलना,, कैसे संभव है इन सब स्वप्निल यादों को भूलना। वो यादगार पल कौन भूल सकता है भला।
राजेन्द्र परिहार “सैनिक”




