हिन्दी राष्ट्रीय एकता और आत्मगौरव की भाषा– जे पी शर्मा – जर्नलिस्ट

प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हम हिन्दी दिवस मनाते हैं। यह केवल एक भाषा का उत्सव नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया। तभी से यह दिन हिन्दी की महत्ता और उसके संरक्षण के संकल्प के रूप में मनाया जाता है। हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। यह लगभग 60 करोड़ से अधिक लोगों की मातृभाषा और संवाद की मुख्य धारा है। भारत की भाषायी विविधता में हिन्दी वह सूत्र है, जो देश के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को जोड़ता है।
हिन्दी और आधुनिक शिक्षा
आज हिन्दी केवल साहित्य की भाषा नहीं रह गई है, बल्कि यह विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कानून और प्रबंधन जैसे आधुनिक क्षेत्रों में भी अपनी जगह बना रही है। यदि इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रबंधन शिक्षा हिन्दी में उपलब्ध कराई जाए तो यह विद्यार्थियों के लिए न केवल आसान होगी, बल्कि हिन्दी को वैश्विक स्तर पर नई पहचान भी मिलेगी। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया, परंतु आज भी सरकारी कार्यालयों और न्यायालयों में अंग्रेज़ी को ही प्राथमिकता दी जाती है। यह स्थिति चिंताजनक है। यदि शासन और प्रशासन वास्तव में जनता के लिए है, तो उसकी भाषा भी जनता की ही होनी चाहिए। फ़ाइलों, नोट्स और निर्णयों में हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग प्रशासन को जनता के निकट लाएगा।
न्याय प्रणाली आम जनता के लिए है, इसलिए उसकी भाषा भी आम जनता की समझ की होनी चाहिए। यदि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी का प्रयोग बढ़ाया जाए तो न्याय व्यवस्था और अधिक पारदर्शी और सुलभ बनेगी। फ्रांस, जापान, जर्मनी और चीन जैसे देश अपनी मातृभाषा में विज्ञान और तकनीकी शिक्षा देते हैं और प्रगति कर रहे हैं। भारत क्यों नहीं हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान की अपार क्षमता है। आवश्यकता केवल इसके प्रयोग और प्रसार की है। हिन्दी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे आत्मगौरव की पहचान है। यह हमारी संस्कृति की आत्मा और राष्ट्रीय एकता की डोर है। हमें हिन्दी को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि शक्ति, संवेदना और विकास का माध्यम मानना होगा।
हिन्दी का सम्मान, राष्ट्र का अभिमान।




