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बारिश और इश्क़ – मीना खन्ना

बारिश और इश्क़ में क्या नाता है
जब आते हैं झूम के आते ,
सूखे मन की प्यास बुझाकर
तन- मन के तरल कर जाते॥

नीले गगन में मेघ उड़ते
बूँद – बूंद ढल अवनि से मिलते,
इश्क़ भी तो बारिश जैसा ,
नस – नस नशे सा घुलता !

पहली बूँद तो गिरे जो तन पर?
मन में जैसे सरगम जागे,
भीगी मिट्टी की ख़ुशबू से
सोये हुए अनुराग सा जागे॥

बादल जैसे बाह पसारे
धरती को शीतल करते है
वैसे ही दो प्यासे दिल,
इक दूजा में ढल जाते हैं !

बारिश रूकती , बादल छँटते
भीगे पत्ते रह जाते हैं,
इश्क़ भी अपना रंग छुआ कर
विरह की ऋतु दे जाता है ॥

जेठ से दिन फिर , भीगी रातें
यादों का सावन छम छम बरसे
जिसे समझते थे साथ हमेशा !
वही दूर स्वप्न में आते

शायद इश्क़ का यही फ़साना,
मिलना बिछड़ना , खो जाना
बारिश जैसा आना उसका
सारी उम्र गीला कर जाना !

बारिश और इश्क़ में ऐसा नाता
दोनों दिल को छू जाते हैं
एक बदन को भिगो के जाए,
एक ह्रदय को भिगोए हरदम॥
मीना खन्ना

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