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बड़ी मुश्किल से नींद आती है __ डॉ सरिता चौहान

 

बड़ी मुश्किल से नींद आती है रातों में क्या करूं क्या कहूं
अब तो हर रात तन्हा लगती है ।
उजालों की चका चौंध से आंख ही चौंधिया गई।
आंखों की उजाला तो रात ले गई।
कैसे कहूं कि तू बेवफा है
या मुकद्दर ने यूं ही कुछ लिखा है।
जीवन भर सितम ढाने वाले को प्यार करती रहना।
उसे बना लेना अपना श्रृंगार और गहना।
क्योंकि तू एक भाई की है बहना।
जिसने डोली में तुझे बिठाकर विदा किया है।
तमाम रीति रिवाज और परंपराओं के साथ।
उसे ता उम्र ढोती रहना।
मां की अर्ज है
कि ऐसे ही सहती रहना
वह है तेरा श्रृंगार और गहना।
दिल की धड़कनों में वो इस कदर उतर आया है।
जैसे आसमान से कोई फरिश्ता उतर आया हो।
फरिश्ता है या इंसान मुझे आज तक उसमें फर्क नजर नहीं आया।
वह जो भी है मैं क्या ही कहूं उसके बारे में,
उसके बिना एक कदम संभालने से पहले ही गिरने की चिंता सताने लगती है।
फिर मैं उससे प्यार जताने लगती हूं।
फिर वह भी मुझसे प्यार जताने लगता है।
पर कुछ पल के लिए।
तू तू मैं मैं फिर शुरू होने लगती है
फिर हम हम झूठी बारिश में भीगते हैं ऐसे।
जैसे कि कपड़े भीगते हों पर मन नहीं भीगता।
एक-एक खटक से अंदर ही अंदर टीस उठती है।
क्या मेरा क्या तेरा हम दोनों तो एक हैं।
फिर भी तनहा रातें और दिन है सुना।
क्या करूं मां क्या ही कहूं
सचमुच क्या है मेरी पहचान उसके बिना।
एक अधूरी सी जिंदगी
एक ऐसी दुनिया में मारी मारी फिरना नहीं चाहती मैं।
दुनिया तो उससे है ना
वो है तो सब कुछ है
उसके बिना कुछ भी नहीं है।
फिर क्या दिन रात बड़बड़ाती हुई
गेहूं की तरह आटा चक्की में पिसती रहती हूं।।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान
।।गोरखपुर उत्तर प्रदेश।।

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