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कहानी : अनकहा फोन — सुनीता तिवारी

 

भोर की पहली किरण के साथ ही अस्पताल के वार्ड में एक नन्ही-सी किलकारी गूँजी।
बेटी के जन्म से घर-परिवार में खुशियों का माहौल बन गया।
रिश्तेदार, पड़ोसी, सभी दिन भर आते रहे, मिठाई खाते रहे, बधाइयाँ देते रहे।
मगर जैसे ही साँझ ढली, एक-एक कर सब अपने घर लौट गए।रात गहरी होने लगी, प्रसूता बिस्तर पर लेटी थी।थकी हुई आँखों में उम्मीद झलक रही थी।उसने कई बार दरवाज़े की ओर नज़र डाली, शायद उसके पति आएँगे, उसका हाथ थामेंगे।परन्तु पति का कोई अता-पता न था।रात लगभग ग्यारह बजे उसने धीरे-धीरे अपना मोबाइल उठाया।किसी अनजाने से नंबर मिलाकर वह बुदबुदाने लगीहाँ आ गया न?देख लेना अकेली हूँ पर अब डर नहीं लग रहा तुम हो न।उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी, जैसे उसे कोई सुकून दे रहा हो।लेकिन हैरानी की बात यह थी कि वह व्यक्ति उसका पति नहीं था।तो फिर वह कौन था?शायद उसका अपना भाई, जो दूर शहर में नौकरी करता था और उसे हर वक़्त सहारा देता था।शायद कोई पुराना दोस्त, जिसके साथ उसने अपने दुख बाँटे थे।या शायद केवल उसकी कल्पना का सहारा, जिससे बात कर वह खुद को अकेला महसूस न करे।उस रात वह रहस्य बना रहा। मगर एक बात साफ़ थी,कभी-कभी इंसान की तकलीफ़ इतनी गहरी होती है कि वह सहारे के लिए किसी भी आवाज़ को अपना बना लेता है।

सुनीता तिवारी

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