क्या आज बेटियों का हर क्षेत्र में आगे आना बेटों के अधिकारों पर प्रहार है?? __ अलका गर्ग, गुरुग्राम

बेटियों का आगे आना बेटों के अधिकारों पर प्रहार बिल्कुल भी नहीं है।ये तो योग्यता की प्रतिस्पर्धा है जो भी योग्य है वही जीतेगा और आगे आयेगा।इसमें बेटे बेटियों में तुलना का तो प्रश्न ही नहीं उठता और उठाना भी नहीं चाहिए।अगर बेटा योग्य या काबिल नहीं है तो क्या बेटी भी यही सोच कर जान
बूझकर कर पिछड़ जाये कि आगे बढ़ना तो भाई का अधिकार है मेरे बढ़ने से उसके अधिकार का हनन होगा।
यह बात तो बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं है।पूरी तरह से निरर्थक है ।
अगर किसी को सही भी लगती है तो सोचे —क्या बेटियों ने बेटों से अधिकार जबरन छीने हैं?
नहीं ना,,तो फिर ये बहस ही निरर्थक है..।
लड़कियाँ स्वभाव से ही कुछ परिपक्व होतीं हैं।वे जल्दी ही किसी बात को आत्मसात् कर लेतीं है उनका यही गुण लड़कों पर भारी पड़ता है और उनसे आगे निकलने में सहायता करता है।
इसलिए वे जल्दी ही पढ़ाई भी पूरी कर लेतीं है।लड़कों का अल्हड़ स्वभाव उनकी रफ़्तार को थोड़ा सा धीरे कर देता है।उनमें गंभीरता ज़रा देर से आती है।परंतु ऐसा नहीं कि बेटे पिछड़ रहे हैं।जहाँ जिसको मौक़ा मिलता है,ये अपना कमाल दिखाते हैं,इसलिये ये तुलना निराधार है।
बचपन से ही बेटियों के कान में फूँका हुआ मंत्र कि तुम्हें हरेक क्षेत्र में पारंगत होना है जिससे कि अच्छा घर वर मिल सके, हमारे कुल का नाम रोशन हो सके उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।आज के युग में भी लड़की का लड़कों से आगे बढ़ना बहुत से लोगों के गले नहीं उतरता।
ऐसे लोग ही बेसिरपैर के तर्क देते हैं कि बेटियों का हर क्षेत्र में आगे आना बेटों के अधिकारों पर प्रहार है।
तो आयें ना आगे..लड़कों को किसने रोका है।सारे नियम कानून मापदंड लड़के और लड़कियों के लिए बराबर बने हुए हैं ।अगर लड़कियाँ अपनी क्षमता के बाल बूते पर कुछ हासिल करती हैं तो इसमें रौष कैसा।
प्रतिस्पर्धा और काबिलियत का मैदान सबके लिए खुला है जो भी दौड़ कर बाजी मार ले तो जीत उसकी।इसमें अधिकारों के हनन और प्रहार का तो सवाल ही नहीं उठता।
अलका गर्ग, गुरुग्राम




