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श्रीकृष्णोपदेश– राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

 

द्वापर युग में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण रूप में अवतरित हुए थे। श्रीकृष्ण रूप अवतार धरती पर प्रेम और रीति नीति, मनुष्य को अपने अस्तित्व और धर्म और विशेषकर कर्म के मूल सिद्धांत का ज्ञान कराने के महान उद्देश्य के लिए ही हुआ था। श्रीरामावतार चौदह कलाओं से परिपूर्ण था जबकि श्रीकृष्ण का अवतार सोलह कलाओं से युक्त था। बचपन काल में पशुओं और प्रकृति के प्रति उदार भाव अपनाने का संदेश
अपनी लीलाओं के माध्यम से दिया। शाश्वत प्रेम के भाव को स्वयं अपनी लीलाओं के माध्यम से संसार को दिया। सबसे महत्वपूर्ण और जीवन मृत्यु और कर्म के सिद्धांत का संदेश उन्होंने युद्ध भूमि में श्रीमद् भागवत गीता ज्ञान अर्जुन के माध्यम से सारे जगत को दिया। मनुष्य को कर्मशील होना अत्यावश्यक है वो भी निर्विकार भाव और परिणाम की परवाह किए बिना करना चाहिए।केवल कर्म करना मनुष्य के अधिकार
में है परिणाम के लिए विधि का विधान बना हुआ है कि जिस प्रकार के कर्म होंगे वैसे ही फल की प्राप्ति स्वयं हो जाएगी।धर्म परायण मनुष्य यदि अधर्मी का वध भी कर देता है तो वह पाप का भागीदार नहीं है। इसके अतिरिक्त श्री कृष्ण ने शासन किस प्रकार का हो, युद्ध और शांति में राजा और प्रजा के क्या कर्तव्य होने चाहिए। शत्रु से कब और कैसा व्यवहार करना चाहिए। श्रीकृष्ण के उपदेश हर काल में प्रासंगिक हैं यह स्वयं सिद्ध और प्रमाणित हैं।

राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

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