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घूंघट में सपने — नीलम सोनी की कलम से

लाखों सपने लेकर एक बेटी ससुराल आती हैं। लेकिन धीरे धीरे वो सपने कहीं खो जाते हैं। दूसरों के सपने और इच्छाएँ पूरा करते करते लड़की अपना वज़ूद खो देती हैं। जिसे वो अपना मानकर जिसके पीछे चलकर लड़की ससुराल आती वो भी उसका नहीं होता जिसके पीछे अपने माता पिता जिन्होंने पाल पोश कर बड़ा किया उनको भी छोडकर जिस घर मे पली बड़ी हुई जिस घर के आंगन मे अपना बचपन गुजारा उन सब को छोडकर अपने भाई बहिन जिन के साथ खेलकर अपना बचपन गुजारा उन सब यादों को भूलकर अपना नया घर बसाने किसी अजनबी की पत्नी बन कर नए घर में प्रवेश करती है और समझती है कि अब यही मेरा आशियाना है उस घर के रीति रिवाज के अनुसार अपने आप को ढालने की कोशिश मे जुट जाती है। सभी छोटे बड़ो का ध्यान रखती हैं। सब की पसंद नापसंद समझने की कोशिश करती हैं। लेकिन बहुत कम ही किस्मत वाली लड़किया होती हैं जिनको समझने वाला ससुराल मिलता है। बेटी से बढ़कर बहु को सम्मान मिलता हो। उसकी हर इच्छाओं का ध्यान रखा जाता हो। अधिकतर घरों मे बहुओं के साथ कामवाली बाई जेसा व्यावहार किया जाया है जैसे बहु नहीं कोई काम वाली नौकरानी हो। बस एक मशीन की तरह सुबह से शाम तक काम करती रहे गलत व्यवहार होने पर भी कुछ ना बोले। धीरे-धीरे वो अपनी हर परिस्थिति से समझोता करने लग जाती है। और वक़्त की चक्की मे पिसती चली जाती हैं। किसी से अपनी मन की भावनाएँ भी व्यक्त नहीं कर सकती। ना अपनी इच्छा से उठ सकती है। ना अपनी इच्छा से बैठ सकती हैं। बोलते हुए भी डरती हैं कि कहीं कोई गलती ना हो जाए। ना अच्छा खा सकती हैं । ना अच्छा पहन सकती हैं बस समय की मझधार में जिंदगी जीती रहती है ।वहां औरत तेरी यही कहानी है।
लेखिका….नीलम सोनी

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