मेरे बचपन के संस्मरण : मेरे प्रथम गुरु लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

वैसै तो मनुष्य जीवन पर्यन्त किसी ना किसी व्यक्ति से कुछ ना कुछ सीखता ही रहता है। कभी कोई घटना भी हमें कोई सार्थक शिक्षा दे जाती है। कहावत प्रचलित है कि माता बच्चे की पहली गुरु या शिक्षक होती है जो उसकी तोतली जुबान को माॅं-पापा बोलना सिखाने से लेकर उसको संस्कारों में ढालती है। लेकिन जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो अनायास ही विद्यालयी शिक्षा की तरफ ही हमारा ध्यान चला जाता है। विद्यालयी शिक्षा के भी कई आयाम हैं जिनका फैलाव प्राथमिक शिक्षा से प्रारम्भ होकर उच्च शिक्षा के शिखर तक है।
विद्यालयी शिक्षा की बात करूॅं तो मैं प्राथमिक शिक्षा को सबसे अधिक महत्वपूर्ण और प्राथमिक शिक्षक को एक कुशल रचनाकार या शिल्पकार के रूप में देखता हूॅं। समाज एक रिक्त पृष्ठ या कच्ची मिट्टी के रूप में उसे एक अबोध बालक सौंपता है जिसे वह एक कुशल शिल्पकार एक प्रतिमा का रूप देकर आगामी साज सज्जा के लिए तैयार करता है। आगामी साज-सज्जा से मेरा तात्पर्य है प्राथमिक स्तर से ऊपर की शिक्षा। प्राथमिक शिक्षक के बाद के सभी शिक्षकगण उस प्रतिमा (छात्र) में अलग-अलग रंग भरते जाते हैं जिसकी वजह से वह उत्तरोत्तर सुंदर, स्वीकार्य और व्यवहारिक बनती जाती है। आज मैं भी अपने प्रथम विद्यालयी शिक्षक के बारे में ही कुछ बातें रखने वाला हूॅं। छ: – सात वर्ष की आयु के मध्य मुझे निकटतम प्राइमरी स्कूल जो कि स्थानीय हरिद्वार नगर पालिका द्वारा संचालित था में कक्षा-१ में भरती करा दिया गया। शहर था मेरा पैतृक नगर कनखल जो तत्कालीन उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के हरिद्वार नगर का एक उपनगर था। आज भी है, बस जिला और राज्य बदल गये हैं। अब जिला हरिद्वार है और राज्य उत्तराखंड। कक्षा में मेरा पहला दिन था। माॅं के आंचल से पहली बार बाहर निकला था। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर किस कारण से मुझे स्कूल भेज दिया गया। यह प्राथमिक विद्यालय छ: सात कमरों का एक भवन था। कक्षा १ से ५ तक के लिए एक-एक कक्ष निर्धारित था। एक कक्ष प्रधानाध्यापक और एक कक्ष शिक्षकों के लिए उपलब्ध था। कुल मिलाकर एक अच्छा और साफ सुथरा विद्यालय था।
प्रवेश की प्रक्रिया उपरांत, विद्यालयी शिक्षा के अपने प्रथम दिवस मुझे कक्षा-१ के कक्षाध्यापक श्री चमेल सिंह जी को सौंप दिया गया। श्री चमेल सिंह मजबूत काठी और सामान्य कद के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे। उस वक्त शिक्षक को मास्टर साहब के सम्बोधन से बुलाने का चलन था। श्री चमेल सिंह जी ने मुझे कक्षा-१ के लिए नियत कक्ष में टाट-पट्टी पर सस्नेह बैठाया। मैं अवाक् था और कक्षा में बैठे अन्य सहपाठियों को कौतुहल पूर्वक देख रहा था। उनमें से मैं किसी को भी जानता नहीं था। अब मेरी अधीरता बढ़ती ही जा रही थी। माॅं की याद सताने लगी थी। कुछ ही देर में मैंने माॅं को याद करके जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। मेरे रूदन ने कक्षा में चल रहे पठन-पाठन को अवरुद्ध कर दिया था। अब क्या था मास्टर श्री चमेल सिंह साहब ने आव देखा ना ताव और जड़ दिया एक तमाचा मेरी गाल पर। मैं स्तब्ध रह गया और डर के मारे चुप होकर बैठ गया। इसके बाद आगामी पांच वर्षों (कक्षा -५) तक मैं उस प्राइमरी स्कूल में पढ़ा लेकिन फिर कभी माॅं और घर को याद करके रोया नहीं। मेरे प्रथम गुरु के एक तमाचे ने मुझे शांत बैठना और अनुशासन में रहना सिखा दिया। मुझे नहीं पता कि अब मेरे गुरु श्रद्धेय चमेल सिंह जी जीवित हैं भी या नहीं। आज शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर मैं उनकी स्मृतियों को प्रणाम् करता हूॅं तथा समस्त शिक्षक समुदाय को नमन् करता हूॅं।




