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संक्षिप्त लेख: हमारा मन — पालजी भाई वी राठोड़ ‘प्रेम

 

सबसे बड़ा न्यायालय हमारा मन होता हैं क्या सही हैं और क्या गलत उसे सब मालूम होता है। लेकिन हम जाहिर नहीं करते।संबंध को ज्ञान और पैसे से भी बड़ा बताया गया है। रिश्तों की बुनियाद सिर्फ सम्बन्धों पर टिकी हुई हैं एक बार सम्बंध खराब हो गए फिर कभी ठीक नही होने।रिश्ते सलामत रखने वाला व्यक्ति सब कुछ सहन कर लेता हैं।अहंकारी ईर्ष्यालु दगाबाज व दूषित मानसिकता का व्यक्ति समाज का कभी भी भला नही कर सकता, अगर कर रहा हैं तो उसका कोई न कोई स्वार्थ होगा।जीवन में ईगो वश परस्पर रिश्तों में दरार आ जाती हैं फिर वह कभी नही भरती। भविष्य में ठीक होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।रिश्ते अत्यंत नाजुक होते हैं,हमें संभालकर एवं संजोकर रखने होंगे इसलिए इन्हें जीवित रखने के लिए समय समय पर प्रेम इंसानियत सद्भाव समर्पण रूपी खाद देते रहना चाहिए जिससे वे जिंदगी फलते फुलते प्रगाढ़ व सुरक्षित रहे। किसी के साथ गलत करके अपनी बारी का इंतजार जरूर करना। क्योंकि समय के साथ हर किसी के कर्मों का हिसाब होना निश्चित हैं देर हैं अंधेर नहीं।भूल जाओ कि यह दुनिया प्यार से चलती हैं।दुनिया तो मतलब और स्वार्थ से चलती है।गूंगा वह नहीं जो बोल नहीं पाता गूंगा वह हैं जो सच पत्ता होने के बावजूद भी चुप रहता है। समय बीत जाने के बाद कद्र की जाए तो वह कद्र नहीं अफसोस कहलाता है।अफसोस जताना मात्र एक औपचारिकता हैं।उनके साथ जरूर रहे जिनका वक्त खराब हैं। लेकिन उनका साथ छोड़ दें जिनकी नियत खराब है।शतरंज में वजीर और जिंदगी में जमीर अगर मर जाये तो खेल खत्म जमीर से जिंदा लोग विरले ही मिलेंगे।हमें अपने सपनों को और लक्ष्य को पूरा करना है तो आत्मविश्वास धैर्य विवेक बुद्धि आदि को साथ रखिये आत्ममंथन करते रहिये
निंदा करने वालों से जो सही लगे उसे लीजिए और बाकी छोड़ते जाइये। विश्वास कीजिए परिश्रम का फल मिलता ही है।किसी भी कार्य को करने से पहले यदि हम कुछ सवालों को अपने आप से पूछ लेते हैं या कुछ बातों को मन में साफ कर लेते हैं तो सफल अवश्य होते हैं। मैं ये कार्य क्यों कर रहा हूँ इसके परिणाम क्या होंगे ये कार्य क्यों जरूरी है क्या मैं इसको कर पाऊंगा इसके लिए छोटे छोटे कदम से आगे बढ़ें सफलता अवश्य मिलेगी।

श्री पालजी भाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ सुरेंद्रनगर (गुजरात)

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