संस्कृति से दूरी मॉर्डन होना कैसे है — अनामिका दूबे “निधि

एक विचारशील लेख
भूमिका:
आज के दौर में “मॉडर्न” या “आधुनिक” होने को लेकर समाज में एक अलग ही परिभाषा बनती जा रही है। फैशन, भाषा, रहन-सहन, सोच और व्यवहार में बदलाव को ही आधुनिकता मान लिया गया है। इस परिवर्तन में लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। सवाल यह उठता है — क्या संस्कृति से दूरी ही आधुनिकता है? क्या अपनी जड़ों को छोड़ देना ही विकास का संकेत है? यह लेख इसी विचार को गहराई से समझने का प्रयास है।
आधुनिकता का सही अर्थ:
आधुनिकता का अर्थ है – सोच में प्रगतिशीलता, तर्क और विवेक को महत्व देना, विज्ञान और तकनीक को अपनाना, और समाज में समानता और स्वतंत्रता को बढ़ावा देना।
मॉडर्न व्यक्ति वह है जो संकीर्ण सोच, अंधविश्वास और रूढ़िवादिता से ऊपर उठकर समाज में बदलाव लाने की सोच रखता है। लेकिन अफसोस की बात है कि बहुत से लोग आधुनिकता की आड़ में पश्चिमीकरण को ही अपनाने लगे हैं और अपनी संस्कृति को पिछड़ापन समझने लगे हैं।
संस्कृति क्या है?
संस्कृति केवल त्योहारों, भाषाओं या परंपराओं का समूह नहीं है। यह हमारे जीवन जीने के तरीके, मूल्य, आचरण, सामाजिक संबंधों और समूह की चेतना का प्रतिनिधित्व करती है।
भारत जैसे देश की संस्कृति हजारों वर्षों की परंपरा, सहिष्णुता, विविधता और समरसता से बनी है। यह हमें जोड़ती है, सिखाती है और एक पहचान देती है।
जब संस्कृति से दूरी बढ़ती है:
जब लोग आधुनिकता के नाम पर:
अपनी मातृभाषा छोड़ने लगते हैं,
पारंपरिक पहनावे को “आउटडेटेड” कहने लगते हैं,अपने बुजुर्गों के ज्ञान को अनसुना करते हैं,रीति-रिवाजों को “पिछड़ा हुआ” मानने लगते हैं,तो यह सांस्कृतिक पतन की शुरुआत होती है।
ऐसे में व्यक्ति एक खोखली पहचान का हिस्सा बन जाता है – न पूरी तरह आधुनिक, न पूरी तरह rooted।
क्या संस्कृति और आधुनिकता साथ चल सकते हैं?
बिलकुल!
सच्चा मॉडर्न वही है जो तकनीक का इस्तेमाल करता है, लेकिन परंपराओं का सम्मान भी करता है। जो सोच में प्रगतिशील है लेकिन अपने मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध भी।
उदाहरण के लिए:
एक व्यक्ति स्मार्टफोन का उपयोग करता है, लेकिन त्योहारों पर अपने गांव जाता है।
वह अंग्रेजी में बात करता है, लेकिन घर में अपनी मातृभाषा बोलता है।
वह जॉब करता है, लेकिन घर लौटकर अपने बच्चों को रामायण की कहानियां सुनाता है।
यह है आधुनिकता और संस्कृति का संतुलन।
पश्चिम की अंधी नकल बनाम विवेकशील अपनापन:
पश्चिमी देशों से हमें बहुत कुछ सीखना चाहिए — जैसे कि समय की पाबंदी, कानून का पालन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि।
लेकिन बिना सोचे-समझे उनकी जीवनशैली, पहनावा या पारिवारिक ढाँचे की नकल करना हमारे लिए हानिकारक हो सकता है।
हमें यह तय करना होगा कि हम क्या सिर्फ फैशन के लिए अपना रहे हैं, और क्या वास्तव में समाज सुधार के लिए।
निष्कर्ष:
संस्कृति से दूरी मॉर्डन होना नहीं है, बल्कि यह अपनी पहचान खो देना है।
सच्ची आधुनिकता वह है जो संस्कृति को साथ लेकर चलती है।
हमें चाहिए कि हम अपने मूल्यों को बनाए रखते हुए, समय के साथ कदम मिलाएं।
आधुनिकता और संस्कृति दो विपरीत ध्रुव नहीं हैं, बल्कि वे साथ-साथ चल सकते हैं — बस ज़रूरत है संतुलन और समझदारी की।
अंतिम पंक्तियाँ:
> “मॉडर्न वह नहीं जो पाश्चात्य दिखे,
मॉडर्न वह है जो सोच में निखरे।
संस्कृति से जो करे संवाद,
वही सच्चा हो प्रगतिशील आज।”
अनामिका दूबे “निधि”




