तनाव ग्रस्त युवा पीढ़ी। पुष्पा भाटी

सम्पादकीय
दशकों तक यह मान्यता रही कि जीवन का सबसे तनावपूर्ण दौर मध्यम आयु (40–50 वर्ष) होता है। इस उम्र में पारिवारिक और व्यावसायिक जिम्मेदारियाँ व्यक्ति को भारी दबाव में डाल देती हैं। किंतु हालिया वैश्विक अध्ययनों ने इस पारंपरिक सोच को बदल दिया है। अब मानसिक तनाव और अवसाद की शुरुआत युवावस्था से ही होने लगी है। ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ्रीका और मध्यपूर्व के 44 देशों में बुजुर्गों की तुलना में युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य अधिक खराब है। यह स्थिति केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं रही, बल्कि विश्वव्यापी प्रवृत्ति बन चुकी है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं—2005 से 2017 के बीच अमेरिका में युवाओं में चिंता और अवसाद के मामलों में 63 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ब्रिटेन में भी वर्ष 2016 के बाद चालीस वर्ष से कम उम्र के युवाओं में मानसिक समस्याएँ तेजी से बढ़ी हैं। इस संकट के पीछे कई कारक हैं। सोशल मीडिया सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। आभासी मंच युवाओं को कृत्रिम चमक-दमक और अवास्तविक जीवन के सपने दिखाते हैं। परिणामस्वरूप, वे वास्तविक परिस्थितियों से जूझने में असमर्थ हो जाते हैं। देर रात तक मोबाइल और इंटरनेट से चिपके रहने की आदत उनकी नींद का चक्र बिगाड़ रही है, जिससे मानसिक संतुलन और अधिक डगमगाने लगता है। दूसरी ओर, रोजगार और भविष्य की अनिश्चितता भी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही है। पहले यह माना जाता था कि नौकरी मिलने के बाद तनाव कम हो जाता है, परंतु अब इसके उलट स्थिति है। कम पढ़े-लिखे युवा कर्मियों में अवसाद का स्तर सबसे अधिक देखा जा रहा है। चिंता का विषय यह भी है कि सामाजिक जीवन से दूरी युवाओं को मानसिक रूप से कमजोर बना रही है। आभासी मित्रता ने आमने-सामने की बातचीत और वास्तविक संबंधों को कमजोर कर दिया है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का कहना है कि परिवार और मित्रों के बीच सक्रिय बने रहने से व्यक्ति तनावमुक्त रह सकता है। इस गंभीर स्थिति से निपटने के उपाय हमारे ही हाथ में हैं। युवाओं को अनुशासित दिनचर्या अपनानी होगी—जल्दी सोना, सूर्योदय के साथ उठना और समय का सही प्रबंधन करना। कृतज्ञता का भाव विकसित करना और जीवन में योगदान देने वालों के प्रति आभार प्रकट करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। सबसे महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया का संयमित उपयोग किया जाए और आभासी संबंधों से अधिक महत्व वास्तविक रिश्तों को दिया जाए। आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तकनीक, जो विकास का साधन है, युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बाधक बन गई है। यदि संतुलन नहीं साधा गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ मानसिक रोगों के दलदल में और गहराई तक धँस सकती हैं। समय की मांग है कि तकनीक को साधन बनाएँ, साध्य नहीं। यही संतुलन युवा पीढ़ी को मानसिक रोगी बनने से बचा सकता है।




