दीपावली: पूजन पर्व या फैशन — अनामिका दूबे “निधि”

दीपावली, जिसे हम प्यार से दिवाली भी कहते हैं, भारत का सबसे प्रमुख और उल्लासमय त्योहार है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। परंतु आज के समय में एक प्रश्न बार-बार उठता है – क्या दीपावली अब एक पूजन पर्व रह गई है, या फिर यह एक फैशन शो में बदलती जा रही है?
पारंपरिक दृष्टिकोण – पूजन पर्व
दीपावली का मूल उद्देश्य धार्मिक और आध्यात्मिक होता है। इस दिन माँ लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर की पूजा की जाती है ताकि घर में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहे। घरों की सफाई, दीपक जलाना, रंगोली बनाना, मिठाइयाँ बाँटना – ये सब परंपराएँ हमारी संस्कृति की जड़ें हैं। यह एक ऐसा पर्व है जो परिवार को एक साथ लाता है और आत्मिक आनंद की अनुभूति कराता है।
आधुनिक दृष्टिकोण – फैशन और प्रदर्शन
वर्तमान समय में, दीपावली का स्वरूप कहीं न कहीं बदलता नजर आ रहा है। पूजा-पाठ के साथ-साथ अब यह त्योहार महंगे कपड़े पहनने, सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट करने, मंहगे गिफ्ट्स देने और दिखावे का माध्यम बनता जा रहा है। टीवी विज्ञापनों और ब्रांड्स की होड़ ने इसे एक “फैशन फेस्टिवल” बना दिया है।
लोग एक-दूसरे से अधिक दिखाने की होड़ में असली भावना को पीछे छोड़ रहे हैं। बच्चे पटाखों की जगह मोबाइल गेम्स में खो गए हैं, और बड़ों के लिए भी पूजा की जगह “फेस्टिव सेल” ने ले ली है।
समझदारी की ज़रूरत
यह जरूरी नहीं कि फैशन या आधुनिकता बुरी चीजें हैं, परंतु जब त्योहारों की आत्मा खोने लगे, तो विचार करना आवश्यक हो जाता है। दीपावली का असली अर्थ तभी पूरा होगा जब हम इसे केवल बाहरी चमक-दमक तक सीमित न रखें, बल्कि इसके भीतर छिपे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदेश को भी अपनाएँ।
निष्कर्ष
दीपावली एक पूजन पर्व है, जो हमें हमारे मूल्यों, परंपराओं और आत्मा से जोड़ता है। फैशन और आधुनिकता को अपनाएँ, लेकिन उसी सीमा तक जहाँ तक वे हमारी संस्कृति को कमजोर न करें। दीपावली केवल पहनावे और तस्वीरों का त्योहार नहीं, बल्कि आत्म-प्रकाश की खोज का अवसर है। आइए, इस दीपावली पर हम केवल दीप जलाएँ ही नहीं, बल्कि अपने भीतर भी सच्चाई और सद्भावना का प्रकाश फैलाएँ।
अनामिका दूबे “निधि”




