शिक्षा नीति और बदलती संस्कृति — महेश तंवर

दीनदयाल एक छोटे से कस्बे में अपनी पाठशाला चलाया करता था।वह अपनी नेक ईमानदारी के आधार से दूर के गांव व शहरों में विख्यात था। बोर्ड परीक्षा परिणाम में अन्य विद्यालयों की बजाय शानदार ही परिणाम रखते थे। दीनदयाल जी के द्वारा पढ़ाये गए बहुत से विद्यार्थी देश के भिन्न-भिन्न राजकीय सेवाओं में सेवा दे रहे हैं।
उन में से एक राजकीय सेवा में सेवारत था, जिला अध्यक्ष ध्यानचंद। जिसका पिता एक खेती हर मजदूर था। जो अपनी कड़ी मेहनत की कमाई ध्यान चंद की पढ़ाई में लगाता रहा। ध्यानचंद भी विद्यालय में भिन्न-भिन्न प्रतियोगिताओं में दीनदयाल जी द्वारा सम्मानित होता रहा।
दीनदयाल जी का विद्यालय छोड़ने के बाद ध्यानचंद उच्च शिक्षा के लिए दूर शहर में रहने लगा और कठिन मेहनत कर राजकीय सेवा में रहते हुए जिलाधीश के पद को सुशोभित किया। दीनदयाल जी भी वृद्धा अवस्था के कारण अपना विद्यालय अपने बेटे बहु को सौंप कर गांव रहने लगा। 8 साल बाद दीनदयाल जी अपने खेत की जमीन के मामले में से जिलाधीश कार्यालय पहुंचते हैं।दीनदयाल जी जिलाधीश ध्यानचंद को करबद्ध नमस्कार करते हैं ।जिलाधीश ध्यानचंद भी बिना देखे नमस्कार कर लेते हैं और अपने काम में लगे रहते हैं। कुछ क्षण बाद दीनदयाल जी ध्यानचंद को पहचान जाते हैं और कहते हैं कि अरे ध्यानचंद! बेटा तू! इतना सुनते ही ध्यानचंद गुस्से में कहने लगे। अरे दीनदयाल जी ! आपको मालूम नहीं कि मैं कौन हूं? किसे आप अरे तू! कह कर बोल रहे हैं। दीनदयाल जी हाथ जोड़कर खड़े हो गए और कहने लगे कि साहब मैं अपने शिष्य ध्यानचंद को समझ कर बोल दिया था, माफ कीजिए। जिलाधीश ध्यानचंद ने कहा, मैं ध्यानचंद ही हूं लेकिन आज मैं जिलाधीश के पद पर हूं और आप एक निजी विद्यालय के सर है। आपने हमें सर कहना ही सिखाया है गुरु नहीं। सर राह चलते किसी को भी संबोधित कर सकते हैं न कि गुरु। गुरु का सम्मान दुनिया में सबसे महान होता है ।वह सदा पूजनीय होता है। गुरु का बखान चंद शब्दों से नहीं किया जा सकता। ठीक है सर दीनदयाल जी आपका काम में शीघ्रता शीघ्र करता हूं ।माफ करना, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के आकर्षण में आकर अपनी विश्व गुरु संस्कृति का लोप मत कीजिए। दीनदयाल जी को अपनी शिक्षा नीति का प्रायश्चित करना पड़ा।




