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विजय उत्सव – दीपक शर्मा

यह दिन न केवल अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की विजय, और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, बल्कि यह हमारे संस्कारों, संघर्षों, और सामूहिक चेतना का उत्सव भी है।
आज का यह विजय उत्सव हमें श्रीराम के आदर्शों की याद दिलाता है — जिन्होंने अन्याय का प्रतिकार किया, धर्म की रक्षा की और एक मर्यादित समाज की नींव रखी।
विजया दशमी केवल पुतलों के दहन का पर्व नहीं है, यह एक आत्मनिरीक्षण का अवसर है —
क्या हम अपने भीतर के रावण को पहचानते हैं?
क्या हम अहंकार, क्रोध, लोभ, और असत्य से लड़ने का साहस रखते हैं?एक शिक्षाविद् होने के नाते मैं यह कहूंगा कि शिक्षा का असली उद्देश्य विजय की भावना को आत्मसात करना है —
न केवल परीक्षा में, बल्कि चरित्र, कर्तव्य और करुणा की कसौटी पर भी विजय पाना।
और एक अधिवक्ता के रूप में मेरा यह कर्तव्य है कि मैं आपको यह याद दिलाऊं — कि न्याय, केवल अदालतों में नहीं होता,
हर बार जब आप किसी अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं, किसी निर्बल की आवाज बनते हैं —
तब आप भी श्रीराम की तरह धर्म की रक्षा कर रहे होते हैं। आज जब हम रावण का पुतला जलाते हैं, तो यह केवल प्रतीक नहीं — बल्कि संकल्प है:
कि हम सत्य बोलेंगे,
अन्याय का विरोध करेंगे,और हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।विजय केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने की नहीं होती,विजय तब होती है जब हम सच्चाई के साथ खड़े होते हैं,विजय तब होती है जब हम अपने माता-पिता और देश का नाम रोशन करते हैं।आज का यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर के संदेहों, भय और आलस्य को हराएं और एक नवीन भारत के निर्माण में सहभागी बनें।अंत में, मैं यही प्रार्थना करता हूं —
कि श्रीराम की मर्यादा,
मां सीता की शक्ति,
और लक्ष्मण की निष्ठा
हम सभी के जीवन में सदैव बनी रहे।

दीपक शर्मा

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