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देव उत्थानी एकादशी देव दीपावली — उर्मिला पाण्डेय उर्मि

भारत बर्ष त्योहारों का विशेष देश है यहां प्रत्येक मास में कोई न कोई त्योहार होता है इसमें देव उत्थानी एकादशी देव शयनी एकादशी को भगवान नारायण क्षीरसागर में सो जाते हैं चार महीने तक आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक सभी कार्यभार भगवान शंकर को सोंप देते हैं देवोत्थानी एकादशी को भगवान जागते हैं और इसी दिन तुलसी और शालिग्राम भगवान का विवाह का उत्सव भी मनाया जाता है जो पांच दिन तक चलता है इन पांच दिनों में किसी भी दिन तुलसी का विवाह कर सकते हैं जिसने कार्तिक माह में सुबह प्रातःकाल स्नान नहीं कर पाया वह इन पांच दिनों में स्नान करके पूरे महीने का फल प्राप्त करता है।इन पांच दिनों को पचभिकियां भी कहते हैं देवोत्थानी एकादशी का महत्व निर्जला एकादशी से भी बढ़कर है देवोत्थानी एकादशी का व्रत सहस्त्र यज्ञ करने के बराबर फल प्रदान करता है अतः सभी को देवोत्थानी एकादशी का व्रत करना चाहिए। द्वादशी के दिन किसी ब्राह्मण को जोड़े सहित भोजन खिला कर श्रद्धा नुसार दान दक्षिणा देकर उसका पारण करे शाम को तुलसी पर दीप अवश्य जलाएं तुलसी जी की आरती करें तुलसी वृंदा का विवाह देवोत्थानी एकादशी को हुआ और त्रियोदशी को उनकी विदाई हुई चतुर्दशी को वह बैकुंठ में भगवान के पास पहुंचीं इसीलिए इसे बैकुंठ चतुर्दशी कहते हैं बैकुंठ चतुर्दशी के दिन चौदह दीपक घी के जलाना चाहिए मुख्य द्वार पर दो दीपक भगवान के पास पूजा घर में दीपक रखें पांच दीपक छत पर एक दीपक जहां से पानी आता है नल समर के पास रखें शेष दीपक तुलसी माता के पास रखें।
इस दिन कोई भी मनुष्य एक वार भी भगवान का नाम लेता है उसे बैकुंठ की प्राप्ति होती है। पूर्णिमा के देवताओं ने तुलसी शालिग्राम के विवाह का उत्सव मनाया था इसलिए पूर्णिमा के दिन देव दीपावली मनाई जाती है तुलसी शालिग्राम की पूजा की जाती है इस दिन गंगा स्नान करने का विशेष महत्व है।
उर्मिला पाण्डेय उर्मि कवयित्री मैनपुरी उत्तर प्रदेश।

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