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मौन समर्पण — कविता साव पश्चिम बंगाल

 

वह नायिका अपने स्वभाव से ही शांत, संयमी और गहन संवेदनशील थी। किसी भी रिश्ते को निभाना उसके लिए केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। उसने नायक से प्रेम किया, पर वह प्रेम किसी उतावलेपन या मोह में नहीं पनपा था। वह प्रेम था—मिट्टी की तरह स्थिर, आसमान की तरह व्यापक और शीतल जुगनुओं की तरह निष्ठावान। नायक उसकी धड़कनों का हिस्सा था और वह नायक की मुस्कान में अपना भविष्य देखती थी। नायक के सपने, नायक की कठिनाइयाँ, नायक की सफलताएँ—सब कुछ उसकी अपनी दुनिया का अक्ष बन गए थे। वह चाहती थी कि जीवन के हर क्षेत्र में, हर मोड़ पर, उसके नायक की आभा बनी रहे; और जहाँ वह परछाईं की तरह खड़ी हो—वहाँ नायक सूर्य की तरह चमके।

नायिका स्वयं के लिए कभी कोई इच्छा नहीं रखती थी। वह देने में विश्वास करती थी, माँगने में नहीं। जीवन ने उसे सिखाया था कि भावनाएँ जितनी कम व्यक्त की जाएँ, उतनी सुरक्षित रहती हैं। लेकिन नायक से उसे कुछ अलग-सी सहजता महसूस होती थी—एक भरोसा, एक अपनापन, मानो उसके सामने वह अपनी सारी दीवारें गिरा सकती है। इसी विश्वास के चलते उसने पहली बार जीवन में किसी के सामने अपनी एक इच्छा रखी। वह इच्छा बड़ी नहीं थी—पर नायिका के लिए उसका मनोवैज्ञानिक अर्थ बहुत बड़ा था। उसने नायक को कसम देकर कहा था, क्योंकि वह जानती थी कि कसम देकर कही बात को नायक हल्के में नहीं लेगा। उसकी आँखों में यह विश्वास साफ़ था कि “तुम मेरे हो, इसलिए मेरी इच्छा तुम्हारी जिम्मेदारी है।” और नायक ने मुस्कुराकर कहा भी था—हाँ, वह उसकी इच्छा पूरी करेगा।

पर समय ऐसा शिक्षक है जो चेहरे बदल देता है। धीरे-धीरे नायक के वादे ढीले पड़ने लगे। पहले वह कहता—“बस थोड़ा समय दो।” फिर समय बढ़ता गया। फिर बहानें बनने लगे। और अंत में एक हल्की-सी अनदेखी, जो नायिका के लिए गहरी चोट बन गई। नायिका जानती थी कि वह इग्नोर हो रही है, पर फिर भी उसके भीतर समर्पण की जड़ें इतनी गहरी थीं कि वह हर चोट के बाद भी वहीं खड़ी रहती। वह सोचती—“शायद वह व्यस्त होगा… शायद उसे कोई दिक्कत हो… शायद उसे मेरे शब्द भारी लगे हों…” उसके मन में नायक के प्रति आरोप नहीं, बस चिंता और उम्मीद थी। वह नहीं जाना चाहती थी, क्योंकि वह प्रेम को छोड़ने वालों में से नहीं थी।

नायक की उदासी या दूरी को वह हर दिन पढ़ती रही, जैसे कोई पुराना पत्र, जिसके कागज़ पीले पड़ चुके हों। फिर एक दिन अचानक नायक का संदेश आया—“I miss you.” यह संदेश किसी प्रेम की पुकार नहीं लगा, बल्कि ऐसा लगा जैसे कोई व्यक्ति अपनी खो चुकी वस्तु को याद करके sigh ले रहा हो। नायिका के भीतर कुछ टूट गया। वह चौंक गई। यह कहना कैसा था? वह तो थी, हर दिन, हर पल—मौन प्रतीक्षा में। वह कहीं नहीं गई थी, वह मरी नहीं थी, वह अब भी साँस ले रही थी, दिल में वही प्रेम लिए, वही उम्मीद लिए। नायक ने उसे ‘याद’ करके रख दिया—जैसे किसी अनुपस्थित को पुकारा जाता है।

उस एक संदेश ने नायिका की सारी पीड़ा को आवाज़ दे दी। उसका हृदय जैसे वर्षों के संयम के बाद बोलने को मजबूर हो गया। उसके शब्द कंपकंपाए नहीं, बल्कि ठहरकर निकले—“मैं मरी नहीं हूँ… अभी जिंदा हूँ।” यह उत्तर एक चुभन नहीं था, एक पुकार भी नहीं; यह याद दिलाना था कि प्रेम को ‘याद’ नहीं किया जाता—उसे देखा जाता है, निभाया जाता है, और जिया जाता है। नायिका ने इस एक वाक्य में वह सब कह दिया जो वह महीनों से महसूस कर रही थी। यह वाक्य उसके आहत होने, उपेक्षित होने और अब भी प्रेम करते रहने की सम्पूर्ण कथा बन गया।

अब नायक पर था कि वह इन शब्दों के अर्थ को समझे या न समझे—पर नायिका अपनी जगह सचमुच ‘जिंदा’ थी। उसके प्रेम, उसकी प्रतीक्षा, उसकी निष्ठा का जीवन अभी भी धड़क रहा था। पर उस धड़कन में अब एक सत्य भी जुड़ गया था—कि समर्पण का भी एक घाव होता है, जिसे सिर्फ वही महसूस कर सकता है जिसने सच्चे मन से किसी का साथ निभाया हो।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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