पैबंद — डॉ निर्मला शर्मा सहायक आचार्य

दिवाली बीत जाने के बाद जब शहर की गलियों में कदम रखा, तो लगा मानो पूरी फिज़ा गुलाबी सर्दी की चादर ओढ़े हुए है। हवा में ठंडक थी, लेकिन मन में एक अजीब सी कोमलता घुली हुई। सड़कों पर नज़र गई तो देखा – जहाँ कभी गड्ढे थे, टूटी हुई सड़के थीं ,वहां अब पेच (पैबंद)लगे हुए थे। सड़कों की पूरी तरह मरम्मत हो चुकी थी। टूटी-फूटी सड़कें मानो नये वस्त्र पहनकर खड़ी थीं। ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी भी कितनी कुछ सड़कों सी है । जरा सी टूटन पर पेच लगा दो तो फिर से चलने लायक हो जाती है।
त्योहारों का यही तो सबसे बड़ा पाठ है – वे हमें पेच लगाने की कला सिखाते हैं। कभी बर्तनों पर, कभी कपड़ों पर, तो कभी मन और रिश्तों पर। त्योहार आते नहीं, जैसे मरहम लेकर उतरते हैं ।हर दरार, हर खरोंच को भरते हुए हमें पूर्ण और मन को नया रूप दे देते हैं। जिस तरह से सड़कों पर पेच लगाए गए हैं, वैसे ही कई घरों में कपड़ों पर इन दिनों पेच लगाए गए होंगे, किन्तु जिन्हें सब कुछ नया खरीद लेने की आदत है या जिनके पास खरीदने के लिए पैसे हैं वे नहीं जानते कि “पेच” क्या होते हैं ? पर जो लोग पेच लगाकर पुरानों को फिर से सहेज लेते है वे जानते हैं कि सच्ची मरम्मत किसे कहते हैं? पेच लगाने का क्या महत्व है ? जिस तरह सड़क पर डामर का पेच उसकी उम्र बढ़ा देता है, वैसे ही कपड़े पर सिला गया छोटा-सा टुकड़ा गरिमा को बरकरार रखता है और मन पर लगाया गया पेच रिश्तों की गर्माहट को फिर से लौटा लाता है। पर अब वह ज़माना नहीं रहा पेच लगाने का। अब तो फटे कपड़े की फैशन हैं उसी तरह फटे मन–सामान्य सी बात है। अब पेच लगाना पुरानी सोच कहलाता है। जो सहेजना चाहता है, उसे या तो “संवेदनशील” कहकर हँसी का पात्र बना दिया जाता है या “कमज़ोर” कहकर भुला दिया जाता है।
त्योहार बीत गया। सड़कों पर पेच लग चुके, घरों की सफ़ाई हो चुकी है पर न जाने कितने हृदय अब भी फटे पड़े हैं, जिनको अपनेपन का धागा नहीं मिला ।कितने रिश्ते अब भी बिना मरम्मत के तार-तार हुए बिखरे पड़े हैं। कहने को तो “हार्ट सर्जरी” के नाम पर हृदय की रिपेयरिंग भी होती है, लेकिन हृदय के अंदर पनपने वाले भाव अब रिपेयर नहीं होते हैं कहनेका आशय अब हृदय की धड़कनों पर तो पेच लगाने से रिपेयर हो जाती है, पर हृदय के भावों पर – अब कोई पेच नहीं लगाता। यह आधुनिक जमाना है। फटे- फटे कपड़े पहनने का या फिर उन्हें फेंक देने का। यहाँ पेच लगाने वाले नकार दिए जाते हैं। कपड़े में हो चाहे रिश्ते में।
डॉ निर्मला शर्मा
सहायक आचार्य
उदयपुर राजस्थान



