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बदलते रिश्ते — अलका गर्ग, गुरुग्राम

 

“माँ दरवाज़ा बंद कर लो हमें आने में देर होगी।”
बोलते हुए बेटा बहू लिफ्ट का दरवाज़ा बंद करके चले गए।
घर का दरवाज़ा बंद करके मालती जी ड्राइंग रूम में सोफे पर ही बैठ गईं।आज भी न जाने कितने देर तक जागना पड़ेगा।दोनों आधी रात के बाद ही तो लौटते हैं।दरवाज़ा खोलने के लिए मालती जी अर्धनिंद्रा अवस्था में वहीं सोफे पर पड़ी रहती हैं।कहीं मुझे नींद आ गई और आ कर बेटे ने घंटी बजा दी और इनकी नींद खुल गई तो फिर सुबह तक बेचैनी से करवटें बदलते रहेंगे।नींद की दवाई का दोबारा असर देर से होता है..और अगर जागने पर इनको खांसी का दौरा उठ गया तो बहू बेटे वैसे ही चिढ़ जाते हैं…कहते हैं ना ख़ुद सोते हैं ना सोने देते हैं…
इसलिए मालती जी बिना पति और बच्चों को कुछ बताए चुपचाप सोफे पर अध लेटी पड़ी रहती थीं जिससे कि लिफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही वे जल्दी से घर का दरवाज़ा खोल दें।
जागते हुए मन में पुरानी स्मृतियाँ उभरने लगती हैं।एकलौते बेटे की पसंद से उसका प्रेम विवाह बहुत धूम धाम से कराया।विवाह से पहले लड़की के माँ बाप मालती जी और उनके पति के सामने बिछे रहते थे।उनकी बेटी का पसंद किया हुआ अकेला बहुत ही गुणी कमाऊ लड़का
उनके हाथ से ना निकल जाए।परंतु शादी होते ही सब कुछ पलट गया।अब उन्हें सिर्फ़ अपने दामाद और बेटी से मतलब था। सास ससुर से नहीं।दो साल पहले बहू के पिता भी स्वर्ग सिधार गए तो बहू की माँ अपने बहू बेटे के पास यहीं आ गईं इसी शहर में।तब से उनका यहाँ आना जाना लगा रहता है परंतु वे मालती जी से सीधे मुँह बात नहीं करतीं।उनकी देखा देखी बहू ने भी मालती जी को पहले से और अधिक अनदेखा करना और उलाहना देना शुरू कर दिया।माँ बेटी का यह व्यवहार उन्हें चोट पहुंचाता था पर वे चुप ही रहतीं।
दो बजे लिफ्ट खुलने की आवाज आई तो दरवाज़ा खोल कर वे सोने चली गईं।सुबह सात बजे ड्राइंग रूम से तेज आवाज़ों और रोने के आवाज़ से उनकी नींद खुली।बाहर आ कर देखा तो सोफे पर बहू की माँ बैठी थीं।वे रो रही थीं और अपने बेटे बहू के लिए बुरा भला बोल रही थीं।बहू भी रो रही थी कि भाई भाभी ने उसकी माँ के साथ ऐसा बुरा व्यवहार क्यों किया।रोते रोते बोली कि भाभी तो पराई है पर भाई को क्या हो गया..वह कैसे भूल गया कि ये उसकी अपनी माँ है।
मालती जी को आश्चर्य मिश्रित हैरानी हुई कि बात बात में उनका अपमान करने वाली और उनके बेटे को याद दिलाने वाली कि वह सिर्फ उसका पति है अपनी माँ का बेटा नहीं…उसके लिए आज रिश्तों की परिभाषा ही बदल गई।
उस वक्त सब कुछ मन से झटक कर जल्दी से उन्होंने चाय बनाई और दो कप चाय और पानी ले कर रोती हुई माँ बेटी को तसल्ली देने लगीं
बहू ने हैरानी से सास की ओर देखा फिर धीरे से अपना सिर उनके कंधे पर रख कर सिसकने लगी।

अलका गर्ग, गुरुग्राम

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