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दुपहिया रिक्शा — अलका गर्ग, गुरुग्राम

 

कोलकाता महानगरी..मेरी जन्मस्थली।कुछ तो बात है कोलकाता में जो देश के हर प्रदेश से इंसान वहाँ खिंचा चला आता है।रोज़ी की खोज में या पर्यटन के लिए।सड़क पर चलने वाली दो डिब्बे की ट्रेन यानि कि ट्राम और बिना किसी मोटर या मेकेनिज्म के हाथ से खींचने वाला दुपहिया रिक्शा..यानि कि दो पहिए वाला अनोखा रिक्शा…ये दो परिवहन के साधन जो कोलकाता में हैं वो देश के किसी भी प्रदेश में नहीं।ये दोनों ही पर्यटक का ध्यान बरबस खींचते हैं।
स्कूल आते जाते हम सभी दोस्त अक्सर हाथ रिक्शे में किसी मोटे आदमी को बैठे देख कर उसकी हिलती हुई तोंद को देख कर खूब हँसते थे।
एक दिन देखा एक थुलथुल सी आंटी उससे किराए को ले कर झगड़ रही है।”मैं तो इतना ही दूँगी” बोल कर वह रिक्शे में धम्म से बैठ गईं।रिक्शे वाला रिक्शे का हैंडिल पकड़ कर उन्हें बैठाने के लिए संतुलन बना कर तैयार नहीं था।रिक्शा बच्चों के झूले सी-सा की तरह टेढ़ा हो कर अधिक वजन की तरफ़ झुक गया और देखते ही देखते पतला दुबला रिक्शावाला रिक्शे के दूसरे छोर पर लंगूर की तरह लटक गया।और उधर वो आंटी रिक्शे में ही सड़क पर लेट गईं।वो चिल्ला रहीं थीं।”मोरे गेछी,मोरे गेछी”(मर गई मर गई)
चालक हवा में हाथ पाँव चला कर चिल्ला रहा था और रिक्शा नीचे लाने की नाकाम कोशिश कर रहा था।उसके वजन से तीन गुना वजन वाली आंटी को वो कैसे नीचे ला सकता था।
बड़ा ही हास्यास्पद दृश्य था।हमारा तो हँसते हँसते बुरा हाल था।इतने दिनों से इसी तरह के किसी दृश्य की कल्पना करके करके हँसा करते थे आज प्रत्यक्ष देख रहे थे।राह चलते और भी कई लोग देख कर हँसी नहीं रोक पा रहे थे।चार लोग ज़ोर लगा कर रिक्शे का हैंडल नीचे लाए और उस बेचारे जिमनास्टिक करते हुए चालक को नीचे उतारा।फिर पसरी हुई आंटी को भी बड़ी मुश्किल से सड़क पर से उठाया। आंटी का रौद्र और रिक्शा चालक का करुण रूप देखने के लिए हम वहाँ नहीं रुके और उस दृश्य को याद कर हँसते हुए स्कूल चले गये।

अलका गर्ग, गुरुग्राम

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