गैस कांड/संस्मरण — सुनीता तिवारी

दिसंबर की वो रात आज भी मेरी स्मृतियों में धुँधली नहीं हुई।
आसमान बिल्कुल शांत था लेकिन हवा में एक अनजाना भय तैर रहा था।
आधी रात जब सब गहरी नींद में थे अचानक एक तीखी सी जलन ने आँखें खोल दीं।
मेरा बेटा जो अभी 27 दिन का था जोर जोर से रोने लगा।
कारण न समझ आने पर मेरी माता जी उसे लेकर टहलने लगीं।
उसे लिए हुए ही घर से बाहर निकलीं,
बाहर निकलते ही लगा जैसे हवा जहरीली हो गई हो।
साँस लेना कठिन, आँखों में आग, और चारों ओर डर से भागते लोग।
गली में चीखें गूँज रही थीं, कोई अपने बच्चों को उठा भाग रहा था, कोई बुजुर्गों को पकड़कर सड़क की ओर ले जा रहा था।
उस वक्त किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है।
बस एक ही बात थी,जान बचानी है।
मैं भी परिवार के साथ पकड़ के साथ घर में ही थी।
मन में एक ही सवाल,क्या हम बच पाएँगे
ये जहरीली दुर्गंध कहाँ से आ रही है।
हवा का हर झोंका शरीर को भीतर तक झकझोर रहा था।
किसी के घर का दरवाज़ा खुला, किसी का टूटा,सब मदद की पुकार में बदल गया।
शहर जो कल तक जिंदा था,अचानक मौत की आहट से काँप रहा था।
सुबह का सूरज भी उस दिन उदास था। अस्पतालों में भीड़, सड़कों पर पसरी ख़ामोशी और आँखों में तैरता भय,सब कुछ किसी दुःस्वप्न जैसा।
कई चेहरे हमेशा के लिए ओझल हो गए,कई घरों की हँसी बुझ गई।
सुबह जब मेरी माता जी दूध लेने डेयरी पर गयीं तब मालूम हुआ कि रात में गैस का रिसाव हुआ और बहुत लोग पुराने भोपाल
से भाग कर नए भोपाल आ गए।
क्योंकि पुराने भोपाल में गैस का असर ज्यादा था।
सुबह होते ही सड़कों पर लोग भागते दिखे
जो जहाँ जितना भाग सकता था, जान बचाने को भाग रहा था।
आज भी वह रात मेरे भीतर घाव बनकर जिंदा है।
वह सिर्फ एक हादसा नहीं था, मानवता पर पड़ा एक अविस्मरणीय धब्बा था।
समय ने बहुत कुछ भर दिया, पर उस रात
की जलन, वह भागदौड़, वह बेबस चीत्कार, मेरे मन की स्मृतियों में आज भी उतनी ही तीव्र है।
सुनीता तिवारी




