कहानी शीर्षक: उड़ान का फैसला — डॉ इंदु भार्गव जयपुर

“घर की जिम्मेदारियाँ और सपनों का बोझ उसे रोज़ तोड़ते थे, पर एक पल ऐसा भी आया जब उसने फैसला किया कि वह या तो बदल जाएगी या हालात बदल देगी।”
नेहा हमेशा से कुछ बड़ा करना चाहती थी, लेकिन हालात उसे एक दायरे में बाँधे रखते थे। सुबह से लेकर रात तक घर-परिवार की जिम्मेदारियों में वह अपनी पहचान कहीं खो चुकी थी। अक्सर वह खिड़की से आसमान को देखती और सोचती—क्या मेरी कल्पनाओं को कभी उड़ान मिलेगी?
एक दिन थकान और निराशा से भरी वह आईने के सामने खड़ी हुई। चेहरे पर थकावट थी, पर आँखों में हल्की-सी आग भी। उसी क्षण उसे वो पंक्ति याद आई—“या तो बदल जाओ, या हालात बदल दो।”
नेहा ने उसी दिन निर्णय लिया। उसने रोज़ के कामों के बीच अपने लिए एक घंटा तय किया। उस एक घंटे में उसने ऑनलाइन कोर्स शुरू किया, अपनी पढ़ाई पूरी की और छोटे-छोटे प्रोजेक्ट लेना शुरू कर दिए। शुरुआत कठिन थी, पर उसका संकल्प मजबूत था।
धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी। कुछ महीनों में उसे अपनी पहली नौकरी मिली—घर से ही काम करने की। आय बढ़ी तो घरवालों का नजरिया भी बदलने लगा।
आज नेहा न सिर्फ आर्थिक रूप से सक्षम है, बल्कि अपनी इच्छा से अपनी दुनिया रच रही है। उसने साबित कर दिया कि सपने तभी पूरे होते हैं, जब हम उन्हें उड़ान देने का साहस जुटा लेते हैं!!
हालात नहीं, हौसले इंसान को ऊँचा उठाते हैं।
डॉ इंदु भार्गव जयपुर



