जो बीत गया, वो नए रूप में वापस आएगा — मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

जीवन बड़ा ही अद्भुत सफर है। हर पल, हर मौसम, हर रिश्ता, हर अनुभव–अपना रंग छोड़कर चुपचाप आगे बढ़ जाता है। अक्सर हम सोचते हैं कि जो बीत गया, वह खो गया। पर सच तो यही है कि जीवन में कुछ भी पूरी तरह खोता नहीं, वह किसी न किसी रूप में वापस लौट आता है–और कई बार पहले से भी ज़्यादा खूबसूरत होकर।
बीते सालों की खुशियाँ, हँसी, खिलखिलाहटें… जब दोबारा लौटती हैं तो यादों की गर्माहट बनकर लौटती हैं। वही छोटे-छोटे पल जो तब सामान्य लगते थे, आज दिल को सुकून देने वाली धरोहर की तरह महसूस होते हैं। हम अक्सर कहते हैं।
“कितना अच्छा समय था”–लेकिन शायद उस अच्छे समय को पहचानने का हक़ हमें तभी मिलता है, जब वह बीत चुका होता है। हम बहुत कुछ भूल चुके होते हैं लेकिन फिर से पीछे मुड़कर देखते हैं तो वो सफर भी खूबसूरत था। जैसे यात्राओं में आये बदलाव पहले ऊंटगाड़ी से लोग चलते थे, फिर टक्टर ,बस, टैम्पो, ट्रेन आज उनका स्थान वंदे भारत और फ्लाइट ने ले लिया समय की बचत भी होती है। फ्लाइट से हम आकाश की सैर कर पाते हैं। उजले हुए वातावरण के साथ बादलों को कितना करीब से देख पाते हैं। मन बाग-बाग हो जाता है। एक समय था जब आंगन से फ्लाइट को देखते थे तो कभी ये नहीं सोचते थे कि हम भी इसके सफर का आनंद ले पाएंगे।
यहां पर ये पंक्तियां सही बैठती है।
“जैसी अवस्था हो वहांँ वैसी व्यवस्था ठीक है।”
समय के साथ बदलाव आवश्यक भी है …समय पहले भी सुंदर था आज भी सुंदर है बस उसे किस ढंग से सुंदर बनाना है वो अपने ऊपर निर्भर करता है। जैसे आज की बच्चियों ने दोहरी जिंदगी को स्वीकार कर लिया वो घर बाहर दोनों जिम्मेदारी संभाल लेती है हालांकि दिक्कतें आती है लेकिन अच्छा लगता है जब वो अपने साथ और भी दो परिवारों को वेतन देकर
उनका भी जीवन सुगमता से चला रही है। सास आज बेटियों सा लाड़ बहु का भी कर रही है। बेटे के साथ चाय बहु की भी बना रही है। ये बदलाव सहज रूप से सकारात्मक सोच के साथ स्वीकार करें तो परिवारों में प्रेम बढ़ेगा और सुखद जीवन के साथ स्वस्थ समाज का निर्माण भी होगा। ऐसे परिवर्तन जरूरी है।
जहाँ जैसी परिस्थिति हो,
वहीं वैसी ही नीति गढ़ी जाए,
जो समय की माँग न समझे,
वह व्यवस्था क्यों कहलाए।
समय सदैव परिवर्तन मांगता है।
समय के पड़ाव के साथ हर कठिनाई भी अपना रूप बदलकर लौट आती है। कभी सबक बनकर, कभी हिम्मत बनकर। जीवन हमें हर मोड़ पर कुछ देता है और कुछ छीन लेता है, पर ये लेना-देना व्यर्थ नहीं जाता। गिरना हमें सिखाता है कि आगे कैसे बढ़ना है। साख से गिरा पत्ता हमें सीख देता नये की जरूरत है।
जैसे आज हम गृहणियों ने ही कितना कुछ नया बदल लिया पहले दादी, माँ ,जो काम हाथों से करती थी वो आज आधुनिकता से सब बदल दिए। कपड़े, फैशन,जीने का ढ़ंग कितना कुछ बदल गया। स्मार्ट फोन ने सबको स्मार्ट बना दिया।
आज हम अपनी भावनाओं को लिख सकते हैं। मनोरंजन के अनेक साधन लोगों ने खोज लिए। स्त्रियों ने कीटि पार्टी, भजन-कीर्तन, घुमना-फिरना डांस पार्टी, क्लबों में जाना आज खुशी के साधन बन गए और खुश भी हैं लोग…
शायद यही आज की मांग है।
प्रकृति भी यही संदेश देती है।
पतझड़ में गिरते पत्ते वसंत में नए फूलों का रास्ता बनाते हैं।
रात जाती है तो सुबह नए उजाले के साथ लौटती है।
सूखी मिट्टी भी पहली बारिश में खुशबू बनकर ज़िंदा हो उठती है। टूटा हुआ भरोसा हमें सिखाता है कि किस पर भरोसा करना है,और बिछड़ते लोग सिखाते हैं कि कौन हमारे दिल के कितने करीब है। जीवन का हर अध्याय, हर मोड़, हर विदाई… किसी न किसी नई शुरुआत का संकेत होती है।
इसलिए जो खो गया है उस पर मत अटकिए…वह शायद लौट रहा है, किसी नए रूप में, किसी नई सीख में, किसी नई खुशी में। विश्वास रखिए, कुदरत का हिसाब बड़ा अनोखा है।
कभी-कभी खोकर ही हम पाते हैं।
और जो बीत जाता है…
वह भी एक दिन मुस्कान बनकर, याद बनकर, नसीहत बनकर, ताकत बनकर…नए रूप में वापस आ ही जाता है।
स्थिति से आँख मिलाकर जो चले,
वही सच्चा शासक कहलाता है।
काग़ज़ की योजनाओं से नहीं,
धरातल से न्याय निकल आता है।
व्यवस्था वही जीवित रहती है,जो जन-पीड़ा को पहचाने।
मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’



