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लघुकथा : जिंदगी का सबक -संगति का फल — पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’ ( सुरेंद्रनगर-गुजरात)

 

एक छोटा सा गांव में भारतभाई और भावनाबेन उसका पुत्र भावेश रहता था। बचपन से ही भावेश बड़े लाड प्यार से बड़े हुए थे। इसलिए वो आलसी और बेपरवाह बन गया था।वो गलत मित्रों की संगति में फंस गया था।सारा दिन दोस्तों के साथ पिक्चर देखना क्लब में जाना और धीरे धीरे जुआं और शराब का भी सेवन करने लगा था।भारतभाई अपनी खेती के काम में व्यस्त रहता था।भावनाबेन के पास कई बार भावेश पैसे मांगते थे। मम्मी कुछ पूछे तो कहता; ‘कॉलेज की फी भरनी है,प्रवास जाना है,किताबें लानी है।’ऐसे बाना बता देते थे।भावेश परीक्षा में भी असफल हुआ।भावनाबेन को पता था कि भावेश बिगड़ रहा है। वे बहुत चिंतित रहती थी।एक बार मम्मी ने कहा; ‘बेटा तू पढ़ने में ध्यान नहीं देते हो। दोस्तों के साथ घूमते फिरते हो।तेरे पप्पा को ये बात मालूम नहीं है।अभी भी वक्त है संभल जा तो अच्छा है’। मम्मी की बात भावेश की समझ में आई। उसने मम्मी की माफी मांगी और वादा किया कि वो गलत दोस्तों का साथ छोड़कर अपनी पढ़ाई पर फिर से ध्यान देगा।उसने जिंदगी में सबक मिला गलत दोस्तों की संगति का ये फल है।भावेश ने गलत दोस्तों का संगति छोड़कर पढ़ाई में ध्यान दिया।बहुत लगन से कड़ी मेहनत की और जिंदगी में सफल व्यक्ति बना। भावेश ने यह भी सीख ली की मेहनत और लगन दोनों जीवन में जरूरी है।अच्छा दोस्त तो वही होता है जो हमें सही सलाह दे। हम कुछ गलत करें हैं तो हमें सुधारे। मुश्किल के समय में हमारा साथ दे। बुरी संगत करने से बुरे परिणाम मिलते हैं और अच्छी संगत करने से हमारा काम सुधर जाता है।

“संगत खोटी मत करो होती बुद्धि मालिन,
बिगड़े सारो काज ही करें ना कोई यकीन।”

श्री पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’
( सुरेंद्रनगर-गुजरात)

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