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साहित्य कुंभ छंदशाला की चतुर्थ वर्षगांठ बड़े धूमधाम के साथ सम्पन्न

 

जयपुर। दस दिन छंद प्रतियोगिता धर्मपाल धर्म ‘नीमराना’ के नेतृत्व में चली। जिसमें 18 प्रतियोगियों ने भाग लिया। जिसमें प्रथम सुरेशचन्द्र जोशी नोएडा, द्वितीय कमला बाई छाजेड़ कोलकाता व तृतीय शीला संचेती कोलकाता रही। सभी प्रतिभागियों को सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। 27 दिसम्बर की शाम को काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसका संचालन हिम्मत चोरड़िया कोलकाता द्वारा किया गया।
“मम ह्रदय निवासिनी माँ शारदे”- सुन्दर पंक्तियों से माँ सरस्वती की वंदना शीला संचेती ने की। ऑनलाइन काव्य गोष्ठी में अलग-अलग जगह से लगभग 16 रचनाकारों ने भाग लिया। सभी की रचनाएँ एक से बढ़कर एक थी। धर्मपाल ने ज्यों ही चंदा से हुई, मेरी कुछ पहचान। जाने क्यों रहने लगे, सब जुगनू हैरान।। दोहे सुनाकर खूब वाह वाही लूटी। वही हर्षलता दुधोड़िया ने मिल पीड़ित पतियों ने, सभा एक बुलवाई। हास्य रचना सुनाई। हार कैसे मान लूँ व वाणी के तीर सदा लौट कर आते हैं- रचना सुशीला चनानी ने। धूमिल हो रहा मासूम बचपन प्रेरक रचना सम्पत डागा ने, एक दीप ने किया प्रण कर दूँगा दूर अँधेरा- इन्दु चांडक ने, कितने ही मैं लिख लूँ, ताल, छंद, चौपाई- गुलाब जयपुर से माँ पर शानदार रचना पढ़ा।
उसके बाद कनक पारख ने छंदबद्ध रचना- मंच हमारा सबसे प्यारा, गुरुवर है अनमोल, संगीता चौधरी ने गुजर जाएगा यह दौर, चल प्रकाश की ओर। मंजू शर्मा’मनस्विनी’ ने उस गाँव की सोंधी मिट्टी को, बोलो कैसे भूला जाए? सुनाकर सबको भाव विभोर कर दिया। वरिष्ठ रचनाकार सुरेशचन्द्र जोशी ने पूजा करके क्यों फेंका यूँ, क्या विकल्प नहीं दूजा था-मार्मिक और शानदार रचना सुनाकर सबको सोचने पर विवश कर दिया। खुल गया द्वार सुरंगी सांझ उत्सव का- शीला जी संचेती, सदा ममता भरा आंचल बिछा कर छांव है करती-माँ पर सुन्दर रचना माधवी श्रीवास्तव ने पढा।धोखे बड़े मकान में, कैसे सच अनुमान-आज के सभ्य समाज पर चोट भारती सुजीत बिहानी ने, मृग नयनी के रुप की, बातें चारों ओर सरोज दुगङ “सविता” ने सुनाया। और कार्यक्रम के अंत में हिम्मत चोरड़िया ने आज की ज्वलंत सम्या बाल तस्करी पर सबका ध्यान खींचा। भारत धार्मिक देश, बढ़े क्यों धंधे काले। रचना पढ़कर सबका आभार ज्ञापित किया।

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