हमारे जमाने के माता पिता – सुनीता तिवारी

हमारे ज़माने वाले माता-पिता आज की तेज़ रफ्तार दुनियां में अक्सर पुराने कहे जाते हैं पर उनकी सोच और जीवन-मूल्य आज भी उतने ही गहरे हैं।
वे कम साधनों में भी संतोष ढूँढ़ लेते थे और बच्चों के चेहरे की मुस्कान को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते थे।
पिता सुबह तड़के उठकर काम पर निकल जाते, चाहे धूप हो या बारिश।
थकान उनके चेहरे पर होती पर घर आते ही बच्चों की पढ़ाई, उनकी ज़रूरतें और माँ की बातें ध्यान से सुनते।
माँ का संसार घर की चारदीवारी तक सीमित था, फिर भी उसी दायरे में उन्होंने त्याग, धैर्य और ममता की पूरी दुनियां बसा दी थी। उनका प्यार शब्दों में कम, कर्मों में ज़्यादा दिखता था।
उन दिनों महँगे खिलौने नहीं थे, पर माता-पिता की कहानियाँ और सीख ही थीं। वे अनुशासन सिखाते थे, पर संवाद से।
डाँटते भी थे, तो भलाई के लिए।
बच्चों की गलती पर समाज से पहले खुद को टटोलते थे कि कहीं परवरिश में कमी तो नहीं रह गई।
आज जब बच्चे अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं तब वही माता-पिता मोबाइल की घंटी या दरवाज़े की आहट पर खुश हो जाते हैं।
उन्हें बड़े उपहार नहीं चाहिए, बस थोड़ा समय और अपनापन चाहिए।
हमारे ज़माने वाले माता-पिता पीढ़ियों के बीच एक सेतु हैं।
वे हमें जड़ों से जोड़ते हैं और सिखाते हैं कि संस्कार, सादगी और प्रेम ही जीवन की असली पूँजी है।
सुनीता तिवारी




