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माता-पिता: अनमोल धरोहर। सुनिता त्रिपाठी’अजय जयपुर राजस्थान

 

माता और पिता ईश्वर की ओर से मिला सबसे अनमोल उपहार होते हैं। उनका स्थान जीवन में कोई नहीं ले सकता। माँ की ममता और पिता का संरक्षण ही जीवन को सही दिशा देता है। वे हमारे पहले शिक्षक, पहले मित्र और सबसे बड़े शुभचिंतक होते हैं। उनका प्यार निस्वार्थ होता है, जिसमें कोई स्वार्थ, कोई शर्त नहीं होती।
माता-पिता का महत्व तब समझ आता है, जब जीवन से उनका साथ छूट जाता है। उन्हें खोने का दर्द वही महसूस कर सकता है, जिसने सच में यह पीड़ा झेली हो। एक को भी खो देना हृदय को भीतर तक तोड़ देता है। वह खालीपन ऐसा होता है, जिसे न समय भर पाता है और न ही कोई और रिश्ता। घर वही रहता है, लेकिन घर की आत्मा कहीं खो जाती है।
जब कोई अपने माता या पिता के गुजर जाने के बाद उनके नाम पर स्टेटस लगाता है, तो उसे असंवेदनशीलता कहना बिल्कुल गलत है। यह दिखावा नहीं, बल्कि अपनापन और गहरे दर्द की अभिव्यक्ति होती है। यह उस टूटे हुए दिल की आवाज़ होती है, जो अपनों को शब्दों के सहारे याद करता है। जिनके माता-पिता जीवित होते हैं, वे शायद इस पीड़ा को न समझ पाएं, लेकिन जिसने इस दर्द को जिया है, वही जानता है कि यह यादें साझा करना मन को थोड़ा हल्का करता है।
माँ की डाँट, पिता की सीख, उनका साया—जो कभी साधारण लगते थे—उनके जाने के बाद जीवन की सबसे कीमती पूँजी बन जाते हैं। तब समझ आता है कि वे सिर्फ रिश्ते नहीं थे, बल्कि हमारी हिम्मत, हमारी पहचान और हमारा सहारा थे। उनकी कमी हर खुशी में महसूस होती है और हर सफलता अधूरी लगती है।
इसलिए जब तक माता-पिता हमारे साथ हैं, उनका मान-सम्मान करें, उनसे खुलकर बात करें और उनके साथ समय बिताएँ। क्योंकि माता-पिता अनमोल धरोहर हैं, और उन्हें खोने का दर्द जीवन भर साथ चलता है। जो चला गया, वह वापस नहीं आता, केवल उसकी यादें रह जाती हैं—और उन्हीं यादों में हमारा प्रेम, अपनापन और गहरा दर्द बसता है।
सुनिता त्रिपाठी’अजय जयपुर राजस्थान

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