संस्मरण: मददगार — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’

संस्मरण: मददगार — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
मैं जब प्राथमिक शिक्षक की नौकरी एक छोटा सा गांव में करता था तब की यह बात है।
आज ही मुझे यह बात का संस्मरण होता रहता है।
मेरे घर पे कुत्ता और बिल्ली रहता था। कुत्ते का नाम मोती और बिल्ली का नाम मिनी रखा गया था। मोती और मिनी में इतनी मित्रता हो गई थी कि वो एक दूसरे के बिना रह पता नहीं थे। साथ में रहते थे। साथ में सोते घूमते फिरते थे। जब भी हम कुछ भी खाना खिलाए तो वह बांट कर खाया करते थे। रोटी दूध जो भी हो अकेले कुछ नहीं खाते थे।बांट कर ही खाते थे।
मोती और मिनी में इतना पक्का रिश्ता था कि एक दूसरे कभी झगड़ते नहीं थी। सुख दुःख में साथ देते थे। एक दूसरे का मददगार बनते थे।यह देखकर मैं और मेरी पत्नी सोचते थे कि ये पशु होकर भी इनमें कितनी मानता है। एक दूसरे में कितना प्रेम है। कभी भी लड़ते झगड़ते नहीं है। बाहर से कुछ खाना लाए तो भी बांट कर खाते हैं। एक दूसरे की मदद करते हैं।जब कि हम मानव होकर भी पशुता जैसा व्यवहार क्यों करते हैं।
मानवता मानव जीवन का आभूषण है प्राणी मात्र के प्रति हमें संवेदना रखना जरूरी है। जब कोई जरूरतमंद हो तो उसकी ज़रूरतें पूरी करना मानव का कर्तव्य होता है। हमारे देश में अलग अलग जाति के लोग रहते हैं। फिर भी हमें अनेकता में ऐकता रखकर मानवता पूर्ण व्यवहार करना जरूरी है। राग द्वेष मिटाकर प्रेम से रहना है। एक दूसरे कि मदद करनी जरूरी है।इंसान को इंसान बनना जरूरी है। इंसानियत ही बडा धर्म है।
ये कुत्ता बिल्ली उस का नाम मोती और मिनी पशु होकर भी मानवता का संदेश समाज को दिया। आज भी मुझे यह संस्मरण होता रहता है। हम सभी दुनियां में अपना किरदार निभाने आये हैं
अपना किरदार सबसे बेहतर निभाओ कि दुनियां आपको याद रखे आपकी मिसाल दे।
श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ सुरेंद्रनगर गुजरात




